सेना ने कहा है कि कश्मीर में सशस्त्र आतंकवाद की कमर पूरी तरह टूट चुकी है और दशकों पुराने इस मसले का स्थायी समाधान सुनिश्चित करने के लिए विलक्षण ‘राजनीतिक दूरदर्शिता’ दिखाने की जरूरत है। घाटी की जनता हिंसा के दुष्चक्र से ऊब गई और इससे छुटकारा चाहती है।
दक्षिण कश्मीर के पांच जिलों में आतंकरोधी अभियान संचालित करने वाली विक्टर फोर्स के प्रमुख मेजर जनरल बीएस राजू ने कहा कि अब घाटी में अलगाववादियों और सशस्त्र आतंकवादियों के लिए कोई जगह नहीं बची है।
कहीं भी उनका नियंत्रण नहीं रह गया है। इस समय उनकी सारी जुगत अब खुद को महफूज रखने में लगी हुई है। अब वे सेना पर सीधा हमला नहीं कर रहे हैं बल्कि आसान टारगेट को निशाना बना रहे हैं। मसलन, मुखबिरी के शक में आम लोगों की हत्या कर रहे हैं।
मेजर जनरल राजू ने कहा कि अब उनका सारा ध्यान यह सुनिश्चित करने पर है कि आतंकी संगठनों में नई भर्तियां न होने पाएं। साथ ही लोगों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की जा रही है कि सेना उनकी मदद के लिए तैयार है।
इसके लिए स्कूलों और कॉलेजों में खास कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। घाटी के लोग इस मसले का हल चाहते हैं। वे हिंसा और प्रतिहिंसा के दौर से बाहर आने के लिए छटपटा रहे हैं।
घाटी के हालात उस मुकाम पर पहुंच गए हैं जहां राजनीतिक पहल की शुरुआत की जा सकती है। यह देखकर अच्छा लग रहा है कि राजनीतिक संकेत मिलने शुरू हो गए हैं।
उनका इशारा गृह मंत्री राजनाथ सिंह के उस बयान की ओर था जिसमें उन्होंने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए किसी से भी बातचीत करने का प्रस्ताव दिया है।
अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फारूक ने इसका स्वागत भी किया है। घाटी में यहां से आगे का सफर केंद्र की राजनीतिक चतुराई और दूरदर्शिता पर निर्भर करेगा।
हमें दो टूक बात करनी होगी। लोगों को यह समझाना होगा की किसी भी सूरत में ‘आजादी’ संभव नहीं है, लेकिन संविधान के दायरे में कुछ भी मुमकिन है। अगर आप आजादी-आजादी चिल्लाते रहेंगे तो गुरबत के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।