पीठ ने विवादित जगह रामलला, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी बोर्ड को बराबर-बराबर हिस्से में बांटने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश (2010) को अतार्किक करार दिया। कहा, हाईकोर्ट का फैसला वैधानिक तौर पर टिकने वाला नहीं था
प्रति कब्जा : वैध जमीन पर नहीं बनी थी मस्जिद
पीठ ने कहा, मुस्लिम पक्ष जमीन पर कब्जा साबित नहीं कर सका। सुन्नी बोर्ड यह भी साबित नहीं कर सका कि वहां हिंदू पक्ष का जबरन कब्जा था। वे केवल यह साबित कर सके कि मस्जिद की देखरेख के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा आर्थिक मदद दी जाती थी। साल 1934 और 1949 में हुए दंगे प्रमाण हैं कि भीतरी अहाते पर कब्जे को लेकर विवाद था। कोर्ट ने माना कि मस्जिद वैध जमीन पर नहीं बनाई गई।
आस्था न्यायिक अधिकार से बाहर : सुप्रीम कोर्ट
कोर्ट ने कहा, एक की आस्था, दूसरे का अधिकार न छीनें। टाइटल आस्था के आधार पर साबित नहीं होता। आस्था पर फैसला न्यायिक जांच के दायरे से बाहर है। हर धर्म के लोगों को संविधान ने बराबर का सम्मान दिया है।
कोर्ट ने फैसले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट को आधार मानते हुए कहा, खुदाई से निकले सुबूतों की अनदेखी नहीं कर सकते। एएसआई ने अयोध्या में 12वीं सदी का मंदिर बताया था। खुदाई के दौरान नीचे मिला ढांचा व कलाकृतियां इस्लामी शैली की नहीं थीं।
मुख्य गुंबद : 1857 से पहले भी होती थी पूजा
कोर्ट ने कहा, संभावनाओं के संतुलन पर, स्पष्ट साक्ष्य बताते हैं कि बाहरी हिस्से में हिंदू पूजा करते थे। यह 1857 से पहले तब भी जारी थी। मुस्लिम ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर पाए जिससे संकेत मिले कि 1857 से पहले मस्जिद पूरी तरह उनके कब्जे में थी।
विशेष शक्ति : अनुच्छेद 142 का प्रयोग
सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिले विशेषाधिकार का प्रयोग कर किसी वाद या मामले में पूर्ण न्याय के मकसद से तदर्थ डिक्री (राजाज्ञा) पारित कर सकता है या आदेश जारी कर सकता है।
पीठ ने कहा, साक्ष्यों के अनुसार, मस्जिद में मुस्लिम नमाज पढ़ते थे। 22-23 दिसंबर 1949 को गुंबद के नीचे मूर्ति रखी गई। यह अपवित्र काम था। 1992 में ढांचा ढहाना कानून का उल्लंघन था। हम संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए जो गलत हुआ, उसे सुधार सकते हैं। मस्जिद के लिए जमीन देना जरूरी है, क्योंकि मुस्लिमों को गलत तरीके से बेदखल किया था। या तो, केंद्र सरकार अधिगृहीत जमीन से इतर या फिर राज्य सरकार अयोध्या में वक्फ बोर्ड को जमीन दे।
जन्मस्थान के दावे का विरोध नहीं
अयोध्या में राम के जन्मस्थान के दावे का किसी ने विरोध नहीं किया। क्रॉस एग्जामिनेशन से भी वहां हिंदुओं के पूजा करने का दावा गलत साबित नहीं हुआ। हिंदू परिक्रमा भी करते थे। चबूतरा, सीता रसोई, भंडारे से भी दावे की पुष्टि होती है।
मस्जिद कब बनी, फर्क नहीं
शिया बनाम सुन्नी केस में भी एकमत से फैसला आया। शिया बोर्ड की अपील खारिज कर दी गई। बेंच ने कहा, मस्जिद कब बनी, इससे फर्क नहीं पड़ता। 22-23 दिसंबर 1949 को मूर्ति रखी गई। एक व्यक्ति की आस्था दूसरे का अधिकार न छीने। नमाज पढ़ने की जगह को हम मस्जिद मानने से मना नहीं कर सकते। बेंच ने कहा कि जगह सरकारी जमीन है।
कई साक्ष्य मौजूद
हिंदुओं के विश्वास और आस्था के साथ कई मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य हैं, जो साबित करते हैं कि जिस जगह 1528 में मस्जिद बनाई गई, वह हमेशा से भगवान राम का जन्मस्थान रहा है। रामायण और स्कंदपुराण सहित धार्मिक ग्रंथों की बातों को आधारहीन नहीं कहा जा सकता।
रामलला न्यायिक व्यक्ति
राम जन्मस्थान पूजा की जगह है। देवता और जन्मस्थान न्यायिक चरित्र धारण करते हैं। हिंदू वहां दैवीय भावना से पूजा करते रहे हैं। पूजा की यह भावना अविनाशी है। यह भावना ही राम जन्मभूमि को बतौर एक स्थान के रूप में स्थापित करती है, जिनकी एक देवता की रूप में पूजा की जाती है। यही वजह है कि रामलला न्यायिक व्यक्ति हैं।
-सुप्रीम कोर्ट