सुप्रीम कोर्ट ने बहुप्रतीक्षित अयोध्या मामले में जनवरी में सुनवाई के लिए बेंच गठित करने और बेंच द्वारा सुनवाई की प्रक्रिया तय करने की बात कही है। कोर्ट के इस कदम को विश्व हिंदू परिषद ने अपनी जीत बताया है तो कांग्रेस ने कहा कि इस मामले में भाजपा का दोहरा रवैया खुलकर सामने आ गया। सीपीआई ने कहा कि कोर्ट ने जनभावनाओं का सम्मान करते हुए अयोध्या मसले पर ज्यादा गहन अध्ययन की तरफ इशारा किया है। हिन्दू महासभा ने कोर्ट के रुख को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है।
विश्व हिंदू परिषद के संयुक्त महासचिव डॉ. सुरेंद्र जैन ने अमर उजाला से कहा कि कोर्ट ने अयोध्या मसले में जनवरी तक की तारीख देकर उनके इस रुख का समर्थन किया है कि केंद्र सरकार को अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए संसद में कानून बनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कोर्ट ने इसी तरह जलीकट्टू मामले में भी सरकार को जनभावनाओं के अनुरूप काम करने का समय दिया था। अब सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के रुख को देखते हुए संसद के शीतकालीन सत्र में कानून बना देना चाहिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस द्वारा यह प्रचारित करना कि यूपी सरकार ने कोर्ट से मसले की जल्द सुनवाई की अपील नहीं की, सरासर गलत है। कोर्ट में न्यास और सरकार के वकीलों ने मामले की दीपावली के तुरंत बाद सुनवाई की अपील की जिसे कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया।
वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राशिद अल्वी ने कहा कि यूपी सरकार के वकीलों ने मामले के जल्द सुनवाई का कोई प्रयास नहीं किया। इससे साबित होता है कि वह इस मामले को लटकाना चाहती है। भाजपा इसी मुद्दे के सहारे 2019 का आम चुनाव जीतना चाहती है, इसलिए वह इस मामले का हल निकालने के लिए प्रयास नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि इससे भाजपा का दोहरा चरित्र सामने आया है जो कोर्ट के बाहर इस मामले की जल्द सुनवाई की बात कहती रहती है।
वहीं दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने खुद अपनी ही सरकार से अपील की है कि केंद्र को अब 100 करोड़ हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए और मंदिर निर्माण में देर नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट के पास 100 करोड़ हिंदुओं के लिए समय नहीं है तो अब सरकार की जिम्मेदारी आ जाती है कि वह हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करे।
सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव अतुल कुमार अंजान ने सुप्रीम कोर्ट के कदम को बिल्कुल सही बताया है। उन्होंने कहा कि बेंच गठित करने में जनवरी तक का समय लेने, और गठित कोर्ट के द्वारा सुनवाई की प्रक्रिया तय करने के फैसले से स्पष्ट है कि कोर्ट यह मानती है कि इस मामले का फैसला देने से पहले गहन अध्ययन करने की जरूरत है। इस मामले में हजारों पेज के दस्तावेज अलग-अलग भाषाओं में हैं। सभी जजों को उन्हें पढ़ने-समझने के लिए उन्हें समय मिलना चाहिए। जिस मामले का असर सौ करोड़ से अधिक की आबादी पर पड़ना हो, वैसे फैसले में इतनी देरी अपेक्षित है। उन्होंने कोर्ट के स्टैंड को बिल्कुल उचित कदम बताया।
हिन्दू महासभा ने सुप्रीम कोर्ट के रुख को निराशाजनक और दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। महासभा के अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि ने कहा कि यही सुप्रीम कोर्ट समलैंगिक विषयों पर सुनवाई में थोड़ी भी देर नहीं करती है लेकिन देश के 100 करोड़ हिंदुओ की जनभावनाओं से जुड़े अहम मुद्दे के लिए उसके पास समय नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि अब नरेन्द्र मोदी सरकार को इस मामले पर तत्काल कानून लाना चाहिए और अपना चुनावी वायदा निभाना चाहिए। अगर भाजपा ऐसा नहीं करती है तो वे पूरे देश में भाजपा के खिलाफ अहिंसक प्रदर्शन करेंगे।