चंपत राय ने कहा है कि वार्ता के जरिए समाधान का समय अब बीत गया है। राम मंदिर पर किसी भी वार्तालाप में विहिप अब हिस्सा नहीं लेगी। उन्होंने कहा कि 1992 से पहले वार्तालाप का समय था। देश के 125 करोड़ लोगों और सरकार को वार्ता के लिए किसने रोका था, लेकिन पहले वार्ता के जरिए जब समाधान नहीं निकल सका तो अब वार्ता के पहल की बात करने की जरूरत ही नहीं। विहिप नेता ने कहा कि उन्होंने धर्म गुरू श्रीश्री रविशंकर प्रसाद को भी हाथ जोडक़र वार्ता की पहल में न पड़ने का आग्रह किया था। मगर वे बात नहीं माने, अयोध्या से लौटे तो उन्हें भी मायूसी हाथ लगी।
कुछ लोगों को भ्रम था कि उन्हें वार्ता के काम में विहिप ने लगाया था, लेकिन लोगों के मन से वह भ्रम भी दूर हो गया। मामले में राम मंदिर के पक्ष में फैसला आने की बात पर जोर देते हुए चंपत राय ने कहा कि भारत सरकार ने न्यायालय को दिए अपने हलफनामे में लिखा है कि कुछ मुस्लिम नेताओं ने कहा है कि यदि विवादित जगह पर मंदिर के प्रमाण मिल गए तो वे हिंदू मंदिर बनाने की बात स्वीकार कर लेंगे। अब जब प्रमाण मिल गए हैं, तो न्यायालय को मामले में फैसला जल्द करना चाहिए।
कानून की मांग से अभी क्यों बच रही विहिप?
राम मंदिर पर कानून बनाने की मांग कर विहिप अभी सरकार की मुश्किलें इसलिए नहीं बढ़ाना चाहती है कि वह मामले को पहले न्यायालय की परिधि से बाहर लाना चाहती है। चंपत राय का कहना है कि जब मामला न्यायालय के विचाराधीन है तो ऐसे में कोर्ट के बाहर कानून बनाने से कोई भी व्यक्ति मामले को चुनौती दे देगा, इसलिए मामले को पहले कोर्ट की परिधि से बाहर आना चाहिए। राम मंदिर को लेकर लंबे समय तक इंतजार कर लिया है। अब थोड़ा और करने में परेशानी क्या है? दरअसल विहिप को उम्मीद है कि न्यायालय का फैसला उसके पक्ष में आएगा। चंपत राय ने बताया कि सुनवाई के दौरान न्यायालय ने ऐतिहासिक साक्ष्य मांगे, तो 1786 का एक फ्रेंच डाक्यूमेंट मिला जिसे बाद में कोर्ट में प्रस्तुत किया गया।
उसके बाद न्यायालय ने वैज्ञानिक प्रमाण की बात की, तो जियो फोटोग्राफी की बात आई। उस वक्त किसी भी भारतीय एजेंसी ने भूमि के अंदर बने निर्माण की फोटो ग्राफी की बात नहीं स्वीकारी। तब वर्ष 2003 में कनाडा की टीम ने इसे स्वीकार किया और उसके दल ने अयोध्या पहुंचकर तस्वीरें ली। कनाडा की टीम ने अयोध्या में विवादित स्थल की जियो फोटोग्राफी कर जो रिपोर्ट सौंपी उसमें उत्तर भारतीय हिंदू मंदिर के भवन निर्माण के स्पष्ट साक्ष्य मिले।
उसके बाद न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) को खुदाई कर अन्वेषण का कार्य सौंपा। एएसआई ने जब अयोध्या के विवादित जगह की खुदाई की तो यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित हो गया कि विवादित स्थल पर मंदिर था। इसी के आधार पर सर्वोच्च नयायालय ने फैसला सुनाया, जबकि भारत का हिंदू समाज वर्ष 1528 से यह बात कह रहा था कि यहां राम मंदिर था जो कि 2003 में साबित हो गया।
पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर
विहिप महासचिव चंपत राय ने राम मंदिर मामले में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर के योगदान की पुरजोर सराहना की। उन्होंने कहा कि पूरे विवाद में यदि किसी प्रधानमंत्री ने ईमानदारी से सकारात्मक भूमिका निभाई तो वे चंद्रशेखर थे। चंद्रशेखर ने तबके तीन प्रमुख राज्यों के मुख्यमंत्रियों मुलायम सिंह यादव, भैरो सिंह शेखावत और शरद पवार को लेकर अयोध्या मामले के समाधान के लिए एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था। इसके अलावा उन्होंने पहली बार गृह मंत्रालय में अयोध्या सेल का गठन किया और उसका जिम्मा किशोर कुणाल सरीखे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को सौंपा। इसके लिए चंद्रशेखर की सराहना की जानी चाहिए।
राम मंदिर निर्माण के लिए 60 प्रतिशत पत्थर तराशी का काम पूरा
चंपत राय ने बताया कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण कार्य को लेकर तैयारियों की शुरुआत 1986 से हो गई थी, जब पूजा के लिए मंदिर का ताला खोला गया। इससे यह तय हो गया कि विवादित ढांचा राम मंदिर है, इसलिए भव्य मंदिर बनने में चाहे जितना भी समय लगेगा मगर बनना तो मंदिर ही है। इसलिए तब से ही विहिप ने मंदिर निर्माण कार्य की शुरुआत कर दी। सर्वप्रथम भव्य मंदिर के डिजाइन को लेकर प्रमुख आर्किटेक्टों से 6 नक्शे मंगवाए गए। संतों की सहमति से एक भव्य इमारत वाला नक्शा तय हुआ।
उसके बाद मंदिर ईंट-गारों के बजाय पत्थर से बनवाने की सहमति बनी, तब से ही पत्थर मंगाने का कार्य शुरू हुआ। शुरू में पत्थर की क्वालिटी का परिक्षण रुड़की से कराया गया। उसके बाद 1993 से पत्थरों की खेप अयोध्या पहुंचने लगी और उनके तराशी का कार्य शुरू है। मंदिर निर्माण के लिए अब तक पत्थरतराशी का 60 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है।
हालांकि अयोध्या तक पत्थर लाने में किसी भी सरकार ने राह में रोड़ा नहीं अटकाया। 1990 से अब तक विभिन्न दलों की सरकारें यूपी में रही हैं, मगर किसी ने भी पत्थर के ट्रक की अनुमति को निरस्त नहीं किया। सरकार की अनुमति से ही ट्रकों पर पत्थर आए हैं। इसके लिए बकायदा सरकार से परमिट भी ली गई।
राम मंदिर विवाद को लेकर अयोध्या की शांति व्यवस्था चौपट होने के सवाल पर विहिप का कहना है कि अयोध्या और आसपास के मुस्लिमों को राम मंदिर निर्माण से ऐतराज नहीं है। आज भी 1800 मस्जिद हैं। 1990 में तीन लाख लोग आए थे, किसी ने भी इन मस्जिद पर एक भी पत्थर नहीं मारा। ठीक उसी तरह हिंदुओं को भी अयोध्या में स्थित अन्य मंदिरों से ऐतराज नहीं है। विहिप महासचिव चंपत राय ने कहा कि अयोध्या में करीब 1800 मस्जिदें हैं। वर्ष 1990 में तीन लाख लोग अयोध्या पहुंचे थे। किसी एक व्यक्ति ने भी इन मस्जिदों में से एक पर भी एक पत्थर तक नहीं मारा।
वे एक खास विवादित जगह के लिए पहुंचे थे। उसे ध्वस्त कर लौट गए। इसके अलावा नजर दौड़ाएं तो बीते कई वर्षों से फैजाबाद का कोई भी मुस्लिम विवादित मस्जिद बचाने अयोध्या नहीं आया। ऐसा ही नजारा अयोध्या के मुस्लिमों ने भी दिखाया। इतने वर्षों में उन्होंने एक बार भी मस्जिद बचाने की कवायद में अयोध्या में कोई विरोध-प्रदर्शन तक नहीं किया, बल्कि राजनीति चमकाने के मकसद से वहां से बाहर के नेता विवाद पैदा किए हुए हैं। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज का स्थान तोड़ा गया है, वह उसे लौटाया जाना चाहिए। इसके अलावा कोई निर्णय मंजूर नहीं है। अयोध्या हमारी मोक्ष भूमि है। इसे छोडऩे का सवाल नहीं।
मथुरावासी 10 प्रतिशत भी योगदान दें तो बनेगी अयोध्या जैसी बात
विहिप महासचिव ने मथुरा के कृष्ण जन्म भूमि मामले पर कहा कि राम मंदिर के लिए अयोध्या में 500 बार तलवार चलाने का इतिहास है। यदि मथुरावासी इसके 10 प्रतिशत भी कर लेंगे तो अयोध्या जैसा फैसला मथुरा में भी होगा। विहिप का यह बयान जताता है कि अयोध्या के बाद वह मथुरा के लिए अपनी मुहिम को धार देगा।
हालांकि विहिप के एजेंडे में पहले अयोध्या के साथ काशी के विश्वनाथ मंदिर और मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि मंदिर का मुद्दा भी था। मगर धीरे-धीरे काशी और मथुरा को छोड़ विहिप ने अपना पूरा ध्यान अयोध्या पर ही केंद्रित कर दिया, लेकिन अब जब अयोध्या पर न्यायालय का निर्णय आने में कुछ माह का ही समय शेष है तो विहिप ने अपने पुराने मथुरा के मुद्दे को धार देना शुरू कर दिया है।