अयोध्या विवाद की सुनवाई के 26वें दिन की शुरुआत करते हुए सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा, लोग जमीन पर एक कमरे के लिए लड़ रहे हैं। 1885 में पूरी जमीन मुस्लिमों को दी गई। बाहर का हिस्सा हिंदुओं को दिया गया। इस पर जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, 1855 से पहले यह मस्जिद के रूप में प्रयोग होती थी।
रेलिंग 1856 के बाद बनी और राम चबूतरा रेलिंग के पास रखा गया। लोग रेलिंग के पास जाते थे। ऐसा शायद इसलिए किया गया हो कि ताकि हिंदू उस जगह पूजा करें तो अहसास हो कि गर्भगृह की पूजा कर रहे हैं। राम चबूतरा ही फोकल प्वाइंट (मुख्य बिंदु) है।
जस्टिस चंद्रचूड़ की टिप्पणी पर धवन ने कहा, यह कयासबाजी है। यह 170 वर्ष पुरानी बात है। मुझे नहीं मालूम कि वे रेलिंग के पास क्यों जाते थे। शायद इसलिए ताकि पूरे ढांचे को कब्जे में ले सकें। धवन ने कहा, 19वीं सदी के गजेटियर और भारत आने वाले विदेशी यात्रियों के यात्रा-वृतांत के अलावा कोई सबूत नहीं है कि वहां पर सिर्फ ‘जन्मस्थान’ था।
उन्होंने कहा कि 1885 से पहले आए यात्रियों के बयानों का महत्व नहीं है। हिंदू पक्ष ने जो साक्ष्य दिए हैं उसमें कहीं यह जिक्र नहीं कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में कहां हुआ था। इस मामले की सुनवाई बृहस्पतिवार को भी जारी रहेगी।
इसमें संदेह नहीं कि राम का जन्म अयोध्या में हुआ
धवन ने कहा, इससे संदेह नहीं कि अयोध्या में भगवान राम का जन्म हुआ। हालांकि रामायण और रामचरितमानस सहित कहीं भी यह जिक्र नहीं कि भगवान का जन्म अयोध्या में कहां हुआ। एक गवाह का कहना है कि राम चबूतरा और बेदी एक ही जगह हैं, वहां पूजा होती थी और वही भगवान का जन्मस्थान है। धवन ने कहा, 1949 से पहले विवादित ढांचे के भीतर मूर्ति नहीं थी। पूजा बाहरी अहाते में राम चबूतरे पर होती थी।
1949 में मूर्ति गुंबद के नीचे रखी गई। 1984-85 में अंदर की मूर्ति के दर्शन शुरू हुए। जस्टिस चंद्रचूड़ ने पूछा, राम चबूतरे और मुख्य गुंबद के बीच कितनी दूरी है? इस पर धवन ने कहा कि 50 गज। धवन ने हिंदू पक्ष की गवाही पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब गवाहों को विवादित जगह की 10 तस्वीरें दिखाई गईं तो वे नहीं पहचान पाएं कि तस्वीर कहां की है।