पीवी नरसिम्हा राव
1992 में पीवी नरसिम्हा राव वे बातचीत की प्रक्रिया को शुरू किया। दोबारा वार्ताकार के तौर पर चंद्रस्वामी की नियुक्ति की गई। इससे पहले की बातचीत किसी परिपक्व नतीजे पर पहुंचती विश्व हिंदू परिषद् (वीएचपी) ने कार सेवको से बाबरी मस्जिद को ढहाने की अपील कर दी। जिसकी वजह से लंबे समय तक अदालत के बाहर होने वाले समझौते की प्रक्रिया रुक गई। इसके बाद दोनों पक्षों ने अपने रुख को पहले से ज्यादा सख्त कर लिया।
अटल बिहारी वाजपेयी
2000-02 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने दोनों पक्षों को औपचारिक तौर पर बातचीत के जरिए मसला सुलझाने के लिए कहा। इसके लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में एक अयोध्या सेल बनाया गया। इसमें वीएचपी और एआईएमपीएलबी के बीच कई दौर की बातचीत हुई। वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी कुणाल किशोर ने मध्यस्थता की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई लेकिन एक बार फिर यह किसी निर्णायक मोड़ तक नहीं पहुंच सकी।
कांची कामकोटिपीठम के शंकराचार्य
2002-03 में एआईएमपीएलबी को एक बार फिर से कांची कामकोटि पीठम के नए शंकराचार्य ने संपर्क किया। जो कुछ प्रस्ताव लेकर लखनऊ के दारुल उलूम नदवतुल उलेमा आए थे। हालांकि एआईएमपीएलबी ने प्रस्ताव की कुछ चीजों को अस्वीकार कर दिया। इसके बाद मनमोहन सिंह के कार्यकाल में मध्यस्थता की कोई कोशिश नहीं की गई। 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश पुलक बसु ने एक हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत की जो इस नतीजे पर पहुंचा कि मध्यस्थता प्रक्रिया को अयोध्या के स्थानीय लोगों पर छोड़ दिया जाना चाहिए।