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इन चार प्रधानमंत्रियों और तीन मुख्यमंत्रियों ने की थी अयोध्या मामला सुलझाने की कोशिश

Sat, 09 Mar 2019 03:43 PM IST
अनिल पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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अयोध्या मसले को सुलझाने की कई बार कोशिश हो चुकी है
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उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद को मध्यस्थता समिति के पास भेजा। इसके लिए अदालत ने तीन सदस्यीय एक समिति का गठन किया है जिसमें सेवानिवृत्त न्यायाधीश कलीफुल्ला, आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर और वकील श्रीराम पंचू शामिल हैं। उन्हें आठ हफ्तों के अंदर अपनी रिपोर्ट अदालत में सौंपनी होगी। आज हम आपको 30 साल पहले उस दौर में ले जाते हैं जब इसी तरह की एक कोशिश पहली बार की गई थी। हालांकि उसका कोई असर नहीं हुआ। वहीं अतीत में आठ प्रधानमंत्री इसे सुलझाने की कोशिश कर चुके हैं लेकिन उन्हें भी सफलता नहीं मिली।

कांची शंकराचार्य

बातचीत के जरिए पहली बार इस मसले को सुलझाने की कोशिश 1986 में हुई थी। तब कांची के शंकराचार्य और तत्कालीन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के मौलाना अबुल हसन अली हसनानी नदवी जो अली मियां के नाम से मशहूर हैं ने इसपर बातचीत की थी। बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी के संयोजक जाफरयाब जिलानी का इस बातचीत पर कहना है, 'अली मियां ने शंकराचार्य से बात की जो मामले से संबंधित बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हो गए जबकि अदालत में मामला जारी था। एक प्रस्ताव बनाया गया और बोर्ड के सदस्य बातचीत के लिए मान गए लेकिन शंकराचार्य पीछे हट गए और उन्होंने इसके लिए माफी मांगी। उनका कहना था कि उनपर कई तरफ से दबाव है।'

विश्वनाथ प्रताप सिंह

जिलानी ने कहा, 'उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई शुक्रवार को की गई मध्यस्थता की कोशिश पहली कानूनी पवित्रता होगी।' इसके बाद 1990 में आपसी सहयोग से इस मसले का हल निकालने का प्रयास किया गया था। उस समय उच्चतम न्यायालय के नेतृत्व में तत्कालीन केंद्र सरकार ने इसे सुलझाने का प्रयास किया था। 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने कुछ अधिकारियों के जरिए अदालत के बाहर समझौते की पहल की लेकिन इससे पहले कि वह प्रक्रिया को औपचारिक रूप दे पाते उन्हें हटा दिया गया और उनकी जगह चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनाया गया।

चंद्रशेखर

1991 में चंद्रशेखर ने अदालत के बाहर समझौता करने की कोशिश की और इसके लिए उन्होंने विवादित तांत्रिक चंद्रस्वामी की नियुक्ति की। जिसने दोनों पक्षों ने कई दौर की बैठक की। उस समय गृह राज्यमंत्री रहे सुबोध कांत सहाय ने एक उच्च स्तरीय समिति का निर्माण किया जिसमें तीन मुख्यमंत्री- मुलायम सिंह यादव, शरद पवार और भैरों सिंह शेखावत शामिल थे। इससे पहले कि यह समिति कोई कार्य कर पाती संसद भंग हो गई और नए सिरे से चुनाव हुए।

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पीवी नरसिम्हा राव

1992 में पीवी नरसिम्हा राव वे बातचीत की प्रक्रिया को शुरू किया। दोबारा वार्ताकार के तौर पर चंद्रस्वामी की नियुक्ति की गई। इससे पहले की बातचीत किसी परिपक्व नतीजे पर पहुंचती विश्व हिंदू परिषद् (वीएचपी) ने कार सेवको से बाबरी मस्जिद को ढहाने की अपील कर दी। जिसकी वजह से लंबे समय तक अदालत के बाहर होने वाले समझौते की प्रक्रिया रुक गई। इसके बाद दोनों पक्षों ने अपने रुख को पहले से ज्यादा सख्त कर लिया।

अटल बिहारी वाजपेयी

2000-02 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने दोनों पक्षों को औपचारिक तौर पर बातचीत के जरिए मसला सुलझाने के लिए कहा। इसके लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में एक अयोध्या सेल बनाया गया। इसमें वीएचपी और एआईएमपीएलबी के बीच कई दौर की बातचीत हुई। वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी कुणाल किशोर ने मध्यस्थता की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई लेकिन एक बार फिर यह किसी निर्णायक मोड़ तक नहीं पहुंच सकी।

कांची कामकोटिपीठम के शंकराचार्य

2002-03 में एआईएमपीएलबी को एक बार फिर से कांची कामकोटि पीठम के नए शंकराचार्य ने संपर्क किया। जो कुछ प्रस्ताव लेकर लखनऊ के दारुल उलूम नदवतुल उलेमा आए थे। हालांकि एआईएमपीएलबी ने प्रस्ताव की कुछ चीजों को अस्वीकार कर दिया। इसके बाद मनमोहन सिंह के कार्यकाल में मध्यस्थता की कोई कोशिश नहीं की गई। 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश पुलक बसु ने एक हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत की जो इस नतीजे पर पहुंचा कि मध्यस्थता प्रक्रिया को अयोध्या के स्थानीय लोगों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। 
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