सुप्रीम कोर्ट में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में मंगलवार को सुनवाई के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इस मामले की सुनवाई लंबे समय के लिए टालने के लिए हरसंभव दलील दी लेकिन वह खुद अपने ही पिछले बयान से घिर गए। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की खंडपीठ में शामिल जस्टिस अशोक भूषण ने उन्हें उनके पिछले बयान की याद दिलाते हुए कहा, ‘अब आप अपने बयान से पीछे हट रहे हैं।
11 अगस्त को हुई पिछली सुनवाई में आपने कहा था कि सुनवाई जनवरी, 2017 से शुरू की जाए और अब आप कह रहे हैं कि जुलाई, 2019 के बाद सुनवाई की जाए।’ इससे पहले वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा कि इस मामले की सुनवाई अक्तूबर, 2018 तक खत्म नहीं हो सकती। लिहाजा इस पीठ को सुनवाई शुरू नहीं करनी चाहिए। सनद रहे पीठ की अध्यक्षता कर रहे चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा अगले वर्ष अक्तूबर में रिटायर हो रहे हैं।
धवन ने यह भी कहा कि पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने मस्जिद में नमाज पढ़ने को इस्लाम का अभिन्न अंग बताया है, ऐसे में इस मामले को सात सदस्यीय संविधान को सुनवाई करनी चाहिए। धवन ने यह भी कहा कि आखिर अदालत इस मामले की सुनवाई करने में जल्दबाजी क्यों दिखा रही है।
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धवन की इन दलीलों पर मेहता और साल्वे ने कहा कि वर्ष 2010 से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। ऐसे में यह कैसे कहा जा सकता है कि अदालत को सुनवाई की जल्दबाजी है। इस पर सिब्बल ने कहा कि संभवत: आजाद भारत का यह सबसे महत्वपूर्ण मामला है।
इस मामले की हर दिन सुनवाई का विश्व और भारत की राजनीति पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। सिब्बल ने कहा कि इस मामले की सुनवाई जुलाई, 2019 (अगले आम सभा चुनाव) के बाद की जाए।