जन्मभूमि वाले मुकदमे में भगवान राम का प्रतिनिधित्व कोर्ट में उनके मानव मित्र विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता त्रिलोकी नाथ पांडे ने किया। दीवानी अदालत से इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा स्थानांतरित होने के दो साल बाद 1989 में रामलला पहली बार वादी बने।
1989 में ही आम चुनाव से पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश देवकी नंदन अग्रवाल ने एक याचिका दायर की थी, जो मालिकाना हक मामले में भगवान राम के जन्मस्थान के केस में मित्र बनने की मांग की थी। वह उस समय विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के कार्यकारी अध्यक्ष थे। उन्होंने अपने दावे में कहा था कि भगवान राम ही इस संपत्ति के असली मालिक हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि विवादित 2.77 एकड़ भूमि का अधिकार देवता रामलला विराजमान को सौंपा जाएगा। हालांकि यह कब्जा केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगा।
बता दें कि अगस्त 2019 को अदालत ने इस मुद्दे की दैनिक सुनवाई सुनिश्चित की और 16 अक्तूबर तक 40 दिन की मैराथन सुनवाई के बाद अपना अंतिम फैसला नवंबर में सुनाने की तारीख दी थी। इस दौरान शीर्ष कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनी। सुप्रीम कोर्ट के लंबे फैसले में कुछ ऐसे तर्क रहे, जिनके आधार पर अयोध्या में विवादित जमीन पर राम मंदिर बनने का रास्ता साफ हुआ।