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अयोध्या मामला: सुलह पैनल की नई अपील पर बिफरे पक्षकार, पढ़ें कब-कब हुई समझौते की कोशिश

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 18 Sep 2019 02:03 AM IST
- फोटो : अमर उजाला (फाइल फोटो)

खास बातें

  • नियमित सुनवाई के बीच सुलह-समझौता पैनल की नई अपील से पक्षकारों में नाराजगी
  • महंत धर्मदास ने समझौता के लिए पत्र लिखे जाने से किया इनकार
  • मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी बोले- समझौते का अब कोई औचित्य नहीं
सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की चल रही नियमित सुनवाई के बीच सुलह-समझौता पैनल की नई अपील से पक्षकारों में नाराजगी है। पैनल ने 155 दिन की कोशिश के बाद सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दे दी थी कि समझौता का रास्ता निकालना मुश्किल है। मगर, जब लगभग सभी पक्षों की दलीलें अंतिम दौर में हों और नवंबर तक फैसला आने की उम्मीद प्रबल हो गई है तो फिर से निर्वाणी अखाड़ा व सुन्नी वक्फ बोर्ड के पत्र के आधार पर समझौता की पहल करने की अनुमति मांगने पर पक्षकारों ने मामले को जानबूझकर अटकाने व भटकाने की कोशिश करार दिया है। इसे अक्षम्य व नियम विरुद्ध ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट से विचार न करने की अपील भी की गई है।

रोड़ा अटकाने वाले राममंदिर के हितैषी नहीं: नृत्यगोपाल दास
जो लोग रोड़ा अटका रहे हैं वे राममंदिर के हितैषी नहीं हैं। मामले को अटकाने का प्रयास करने वाले राष्ट्र के शुभचिंतक नहीं हो सकते। बाबर एक आक्रमणकारी था, वह कभी देश का हितैषी नहीं हो सकता। रोड़ा अटकाने वाले बाबर की संस्कृति के समर्थक हैं।   (मणि रामदास छावनी के महंत व राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष)

दोबारा सुलह-समझौते का कोई औचित्य नहीं: दिनेंद्र दास
कोर्ट में चल रही नियमित सुनवाई के बीच दोबारा सुलह-समझौते की कोशिश का कोई औचित्य नहीं है। ऐसी कोशिशें कई बार विफल हो चुकी हैं। यह तो एक बार फिर मामले को उलझाने का प्रयास है, जिसका हम विरोध करते हैं। (हिंदू पक्षकार व निर्मोही अखाड़ा के महंत)

मैंने पैनल को समझौते के लिए कोई पत्र नहीं लिखा : धर्मदास
सुलह-समझौता गलत नहीं होता, लेकिन कोर्ट की सुनवाई रोक कर कोई बात नहीं होगी। जो भी सुलह-समझौते की बात होनी है वह कोर्ट में ही होगी। मैंने पैनल को समझौते के लिए कोई पत्र नहीं लिखा है। (हिंदू पक्षकार व निर्वाणी अनी अखाड़ा के महंत)
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कोर्ट जो भी निर्णय देगा वह मानेंगे : इकबाल अंसारी
सुलह-समझौते की जो बात सामने आ रही है उसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है। फिलहाल समझौते का अब कोई औचित्य इसलिए नहीं दिखता, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में मामले की नियमित सुनवाई चल रही है, उम्मीद है कि जल्द ही निर्णय आ जाएगा। कोर्ट जो भी निर्णय देगा वह मानेेंगे।  (मुस्लिम पक्षकार)

हताश-निराश लोग अटका रहे रोड़ा : त्रिलोकीनाथ
हताश-निराश लोग मंदिर निर्माण में बाधा उत्पन्न करने का प्रयास कर रहे हैं। चूंकि मुस्लिम पक्ष पूरी तरह से केस हार रहा है इसलिए वह पलायन की मुद्रा में है और नई तरकीब खोज निकाली है।  (रामलला के सखा)

राममंदिर निर्माण में बाधा डालने का प्रयास: शरद शर्मा
यह राममंदिर निर्माण में बाधा उत्पन्न करने का प्रयास है। ऐसे लोग पिछले 70 वर्षों से मामले में रोड़ा अटका रहे हैं। अब जब उन्हें पराजय का डर सताने लगा है तो वे पलायन की नीति तैयार कर रहे हैं और बाबरी समर्थक होने का सुबूत पेश कर रहे हैं।  (विहिप के प्रांतीय प्रवक्ता)

अयोध्या पर कभी सफल नहीं हुई समझौता की कोशिशें
अयोध्या विवाद में सुलह-समझौते की कोशिशें कई बार हो चुकी हैं। पहले भी कई बार अलग अलग पक्षों ने या तो मध्यस्थता की कोशिश की या फिर पेशकश की, लेकिन हर बार यह पहल किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच पाई। राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर और नरसिम्हा राव सरकार में समझौते की कोशिशें भी बेअसर रहीं। 134 साल पहले यह मामला न्यायालय पहुंचा था, 69 साल से मामले की सुनवाई चल रही है।

कब-कब हुई अयोध्या विवाद में सुलह-समझौते की कोशिश

  • वर्ष 1986: शंकराचार्यों ने इस विवाद को बातचीत से सुलझाने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुए।
  • वर्ष 1990-91: तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शरद पवार और राजस्थान के मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत की मध्यस्थता में बात कराई।
  • वर्ष1992: पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में इस विवाद को फिर सुलह-समझौते से हल करने की कोशिश हुई। मंत्री सुबोधकांत सहाय की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई, लेकिन यह भी विफल रही।
  • वर्ष 2002: अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में प्रधानमंत्री कार्यालय में अयोध्या प्रकोष्ठ बनाया गया। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को तैनात करके कई बार सुलह का प्रयास कराया, लेकिन यह भी सफल नहीं हुआ।
  • वर्ष 2003: जून महीने में कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की बात कही थी। शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने 1998 से 2004 के दौरान भाजपा सरकार के समय मध्यस्थ की भूमिका निभाने की बात कही थी।
  • वर्ष 2010: सितंबर महीने में हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के तत्कालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने कहा कि सुलह के लिए प्रयास करने में कोई हर्ज नहीं है। इस पर भी बातचीत का सुझाव आगे नहीं बढ़ सका।
  • वर्ष 2010 से 2016: सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति पलोक बसु ने इस विवाद को अदालत के बाहर मिल बैठकर सुलझाने की कई साल तक कोशिश की। इसमें हिंदू-मुस्लिमों के 10 हजार हस्ताक्षरयुक्त पत्र सुप्रीम कोर्ट में पेश भी किए गए हैं।
  • वर्ष 2016- मई महीने में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी ने हाशिम अंसारी के साथ मुलाकात की। बातचीत आगे बढ़ती इसके पहले ही अंसारी का निधन हो गया।
  • वर्ष 2017- 21 मार्च को राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता की पेशकश की चीफ जस्टिस जे एस खेहर ने कहा है कि अगर दोनों पक्ष राजी हो तो वो कोर्ट के बाहर मध्यस्थता करने को तैयार हैं।
  • वर्ष 2017-16 नवंबर को आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता करने की कोशिश की, उन्होंने कई पक्षों से मुलाकात की। हालांकि रविशंकर की पहल का कोई हल नहीं निकला था।
  • 8 मार्च 2019- सेवानिवृत न्यायाधीश एफएमई कलीफुल्ला के नेतृत्व में तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल गठित। श्रीश्री रविशंकर व श्रीराम पंचू सदस्य।
  • 155 दिन तक चली सुनवाई: नहीं निकला कोई हल। पैनल भंग। 6 अगस्त से सुप्रीम कोर्ट में शुरू हुई रोज सुनवाई।
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