जो शख्स अवध राजघराने का आखिरी नवाब होने का दावा करता था, उसे शान की कसौटी पर देखें तो इस दावे पर भरोसा करना मुश्किल होता है। प्रिंस साइरस ने मेरे एक दोस्त से एक बार गुस्से में चिल्लाते हुए कहा था, ''मुझसे मुगलों के बारे में बात मत करो। वे सब गंदगी की तरह थे।''
जाहिर है 16वीं शताब्दी की शुरुआत से भारत में मुगलों का शासन रहा और जब तक अंग्रेजों ने हिंसक तरीके से 19वीं शताब्दी के मध्य में उन्हें उखाड़ नहीं फेंका तब तक जारी रहा।
भारत में मुगलों का बड़ा और मजबूत साम्राज्य रहा है और इस पर कोई सवाल नहीं है। लेकिन प्रिंस साइरस जोर देकर कहते थे कि उनका वंश ज्यादा महान था। ये अलग बात है इन दिनों वो भयानक गरीबी में रह रहे थे।
यह भी पढ़ेंः सऊदी से गिरफ्तार हुआ अरबपति राजकुमार, दो बार बन चुका है डोनाल्ड ट्रंप का तारणहार
प्रिंस का परिवार
दरअसल प्रिंस अपनी विलक्षण मां के स्वभाव के थे। वो खुद को विलायत महल की बेगम कहती थीं और दावा करती थीं कि वो अवध के नवाब की करीबी वारिस हैं। अवध रियासत का इलाका वर्तमान समय में भारत के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में है।
इस परिवार को कभी बड़ी जायदाद, कई महल और भव्य पार्टियों के लिए जाना जाता था। अंग्रेजों ने इसे स्वतंत्र रियासत का दर्जा दिया था। समकालीन रिपोर्ट बताती है कि कैसे अवध के आखिरी नवाब ने ऐय्याशी और लक्ष्यहीन जीवन के बीच खुद को बेदखल कर लिया था। उन्हें 1856 में बुरी तरह से बेदखल किया गया था।
इस परिवार का सितारा डूब गया था, लेकिन दिमाग से सत्ता बोध खत्म नहीं हुआ था। 1970 के दशक में बेगम ने फिर से सक्रिय होने का फैसला किया। उन्होंने अपने छोटे बेटे और बेटी, सात वर्दीधारी नेपाली नौकर, 15 शिकारी कुत्ते और साथ में खूबसूरत फारसी कार्पेट को लेकर दिल्ली रेलवे स्टेशन के पहले दर्जे के वेटिंग रूम में डेरा डाला दिया था।
यहां वो अड़ गईं कि जब तक भारत सरकार उनके परिवार के बलिदान को मान्यता नहीं देती है वो अपने लोगों के साथ यहीं रहेंगी। उनका दावा था कि उनके परिवार ने 1857 में ब्रिटिश शासन के खिलाफ भड़के विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाई थी।