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दिल्ली में गुमनामी की मौत मर गया अवध का आखिरी 'राजकुमार'

Tue, 07 Nov 2017 02:46 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
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प्रिंस साइरस - फोटो : bbc
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जो शख्स अवध राजघराने का आखिरी नवाब होने का दावा करता था, उसे शान की कसौटी पर देखें तो इस दावे पर भरोसा करना मुश्किल होता है। प्रिंस साइरस ने मेरे एक दोस्त से एक बार गुस्से में चिल्लाते हुए कहा था, ''मुझसे मुगलों के बारे में बात मत करो। वे सब गंदगी की तरह थे।''
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जाहिर है 16वीं शताब्दी की शुरुआत से भारत में मुगलों का शासन रहा और जब तक अंग्रेजों ने हिंसक तरीके से 19वीं शताब्दी के मध्य में उन्हें उखाड़ नहीं फेंका तब तक जारी रहा।

भारत में मुगलों का बड़ा और मजबूत साम्राज्य रहा है और इस पर कोई सवाल नहीं है। लेकिन प्रिंस साइरस जोर देकर कहते थे कि उनका वंश ज्यादा महान था। ये अलग बात है इन दिनों वो भयानक गरीबी में रह रहे थे।
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प्रिंस का परिवार
दरअसल प्रिंस अपनी विलक्षण मां के स्वभाव के थे। वो खुद को विलायत महल की बेगम कहती थीं और दावा करती थीं कि वो अवध के नवाब की करीबी वारिस हैं। अवध रियासत का इलाका वर्तमान समय में भारत के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में है।

इस परिवार को कभी बड़ी जायदाद, कई महल और भव्य पार्टियों के लिए जाना जाता था। अंग्रेजों ने इसे स्वतंत्र रियासत का दर्जा दिया था। समकालीन रिपोर्ट बताती है कि कैसे अवध के आखिरी नवाब ने ऐय्याशी और लक्ष्यहीन जीवन के बीच खुद को बेदखल कर लिया था। उन्हें 1856 में बुरी तरह से बेदखल किया गया था।

इस परिवार का सितारा डूब गया था, लेकिन दिमाग से सत्ता बोध खत्म नहीं हुआ था। 1970 के दशक में बेगम ने फिर से सक्रिय होने का फैसला किया। उन्होंने अपने छोटे बेटे और बेटी, सात वर्दीधारी नेपाली नौकर, 15 शिकारी कुत्ते और साथ में खूबसूरत फारसी कार्पेट को लेकर दिल्ली रेलवे स्टेशन के पहले दर्जे के वेटिंग रूम में डेरा डाला दिया था।

यहां वो अड़ गईं कि जब तक भारत सरकार उनके परिवार के बलिदान को मान्यता नहीं देती है वो अपने लोगों के साथ यहीं रहेंगी। उनका दावा था कि उनके परिवार ने 1857 में ब्रिटिश शासन के खिलाफ भड़के विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
 
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माचल महल

माचल महल - फोटो : bbc
इसी हफ्ते एक सांसद से मेरी मुलाकात हुई। उन्होंने याद करते हुए बताया कि उनसे मिलने की कोशिश की थी तो कैसे उन्होंने अपने कुत्तों को लगा दिया था। आठ साल बाद सरकार को इनकी मांगों के सामने झुकना पड़ा था। सरकार ने इन्हें एक घर दिया जिसका नाम मालचा महल था। दरअसल यह एक मध्यकालीन शिकारी पड़ाव था। यह दिल्ली के रिज क्षेत्र के जंगल में है।

इस महल में बिजली और पानी की आपूर्ति नहीं है और न ही खिड़कियां और दरवाजे। बस एक खुला गलियारा है। इसके बावजूद बेगम ने यहां रहने का फैसला किया था। उन्होंने महल के बाहर एक साइन बोर्ड टांग दिया। उस पर लिखा था, ''प्रवेश निषेध। कुत्तों से सावधान रहें। घुसने वालों को गोली मारी जा सकती है।''

इसे देखते हुए शाही अलगाव को साफ महसूस किया जा सकता है। यह प्राचीन नया घर बबूल के पेड़ों से घिरा है। सालों अवसाद में रहने के बाद राजकुमारी ने अपना जीवन खुद ही खत्म कर लिया। यह सच है या नहीं पर निश्चित तौर पर एक किवदंती बनी। विदेशी पत्रकारों के लिए इस परिवार के बचे सदस्य आकर्षण के केंद्र रहे। मैं भी वहां जाता था।

प्रिंस से मुलाकात
मैं अपने 6 साल के लड़के के साथ था और खुद को बिल्कुल असहज पा रहा था। झाड़-झंखाड़ में जाते हुए काफी मनहूस जैसा लग रहा था। मैं राजकुमार साइरस और उनकी बहन राजकुमारी सकीना को जानता था। ये अपने रुखे व्यवहार के लिए जाने जाते थे। मेरे मन में स्वागत को लेकर कोई उम्मीद नहीं थी।

दुर्गम रास्ते के जरिए उस छोटे पर्वत तक पहुंचा और इसके बाद उन डरावनी दीवारों वाले महल में दाखिल हुआ। मैंने राहत महसूस किया कि यहां भौंकने की आवाज नहीं है। ऐसा लग रहा था कि शिकारी कुत्ते अब बचे नहीं थे। प्रिंस साइरस शुरू में मेरे आने से नाराज हुए, लेकिन बीबीसी के नाम पर उनकी नाराजगी देर तक नहीं रही।

इसके बाद मैंने वहां नियमित रूप से जाना शुरू कर दिया। राजकुमार साइरस ने बरसात का पानी छत से रिसने, मकड़ियों और रात में सियारों की चीख को लेकर बात की, लेकिन ज्यादातर बात उन्होंने अपने परिवार की त्रासदी और सालों से हुई नाइंसाफी के बारे में की।

मैंने महसूस किया कि मेरे पहले दौरे के कुछ महीने पहले राजकुमारी सकीना की मौत हो गई थी। उस मलबे की तरह घर में अब राजकुमार साइरस अकेले रहते थे।
उन्होंने मुझे अपनी मां के लिए रखी टेबल सेटिंग दिखाई थी। उन्होंने यह भी कहा कि कैसे वो हर सुबह अपनी मां के लिए ताजा पानी गिलास में भरते थे। यह साफ है कि वो भयानक अकेलेपन से जूझ रहे थे। उन्हें अपनी श्रेष्ठता पर अडिग भरोसा था।

जहां तक मुझे पता है उस आधार पर कह सकता हूं कि वहां न्यूयॉर्क टाइम्स की ब्यूरो चीफ की भी पहुंच थी। वो जुलाई में दिल्ली से चली गई थीं। मैं भी पूरी गर्मी शहर से बाहर था। ऐसे में मैंने भी प्रिंस साइरस को कुछ महीनों तक नहीं देखा। मैं पिछले हफ्ते वहां फिर से पहुंचा था।

जब मैंने नाम लेकर आवाज लगाई तो उस घर में खामोशी पसरी थी। उनकी मां की टेबल वहीं थी, लेकिन पानी में हरा शैवाल फैला हुआ था। उनके सामान बिखरे पड़े थे। फ्लोर पर पत्र और बिजनेस कार्ड पड़े थे। ये सभी पत्रकारों के थे। मुझे पता चला कि उनके शव को पुलिस ने एक महीने पहले बरामद किया था।

जिंदगी हो या मौत राजकुमार साइरस ने अपने परिवार के भरोसे को कभी तोड़ा नहीं था। साइरस की बहन सकीना ने एक बार एक सहकर्मी से कहा था कि, ''मामूलीपन न केवल अपराध है बल्कि एक पाप है। निश्चित तौर पर साइरस और उनके परिवार की जिंदगी में कुछ भी साधारण नहीं था। लेकिन उनकी शान और उनकी त्रासदी दोनों अलग रही।
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