त्योहारी सीजन में हवाई किरायों को काबू में रखने के लिए केंद्र सरकार मूल्य स्थिरीकरण कोष (पीएसएफ) को फिर शुरू करने की संभावना पर विचार कर रही है। इसका मकसद महंगे एविएशन टर्बाइन फ्यूल से एयरलाइंस को राहत देना है। सरकार स्टेकहोल्डर्स से मिले सुझावों के आधार पर पुरानी योजना में बदलाव भी कर सकती है।
पीएसएफ का उद्देश्य एटीएफ की कीमतों में होने वाले तेज उतार-चढ़ाव का असर कम करना है। ईंधन की लागत स्थिर रहने से एयरलाइंस के खर्च पर दबाव घट सकता है। इसका फायदा यात्रियों को किरायों में राहत के रूप में मिल सकता है। सरकार ने जून में 10,000 करोड़ रुपये के पीएसएफ की योजना पेश की थी। इसमें एयरलाइंस के लिए एटीएफ की कीमत 36 महीने तक तय रखने का प्रस्ताव था।
स्कीम शुरू होने के बाद एयरलाइंस को 60 दिन के भीतर आवेदन करना था। साथ ही, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के साथ एमओयू करना था। हालांकि, उस समय किसी एयरलाइन ने योजना में रुचि नहीं दिखाई। अब सरकार इसे फिर से लाने पर विचार कर सकती है। इस बार एयरलाइंस और अन्य स्टेकहोल्डर्स के सुझावों के आधार पर शर्तों में बदलाव संभव है।
इस योजना में शेड्यूल्ड भारतीय एयरलाइंस की भागीदारी स्वैच्छिक रखी गई थी। यानी किसी एयरलाइन के लिए इसमें शामिल होना जरूरी नहीं था। स्कीम से जुड़ने वाली एयरलाइंस को ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के साथ करार करना था। इसके तहत आयल मार्केटिंग कंपनियों को एयरलाइंस को ब्याज मुक्त एडवांस देना था। योजना की अवधि 36 महीने रखी गई थी। हालांकि, अगर एडवांस की पूरी रकम इससे पहले वापस मिल जाती है, तो योजना की अवधि वहीं खत्म हो जाती।
दरअसल, एटीएफ एयरलाइंस के बड़े खर्चों में शामिल है। इसकी कीमत बढ़ने पर एयरलाइंस की ऑपरेटिंग कॉस्ट भी बढ़ती है। इसका असर आगे चलकर हवाई किरायों पर पड़ सकता है।पीएसएफ के जरिए ईंधन की लागत में ज्यादा स्थिरता लाने की कोशिश है। कीमतों को लेकर अनिश्चितता रहने से एयरलाइंस अपने खर्च और किरायों की बेहतर योजना बना सकती हैं। फिलहाल पीएसएफ को दोबारा शुरू करने पर चर्चा हो रही है। स्कीम का अंतिम स्वरूप और शर्तें स्टेकहोल्डर्स से बातचीत के बाद तय हो सकती हैं।