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Dowry Act: अतुल सुभाष का हत्यारा कौन, ऑनलाइन सुनवाई और निश्चित समय में मिलता न्याय तो बच जाती जान

डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: राहुल कुमार Updated Sat, 14 Dec 2024 01:41 PM IST

सार

 Atul Subhash case: बेंगलुरु के इंजीनियर अतुल सुभाष की आत्महत्या ने देश में दहेज कानून को लेकर बहस शुरू हो गई है। लोग इस मामले में मौजूदा न्याय प्रणाली पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
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पत्नी निकिता के साथ अतुल - फोटो : अमर उजाला


ऑनलाइन सुनवाई होती तो बच जाती अतुल की जान

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अश्विनी कुमार दुबे ने अमर उजाला से कहा कि आजकल हर आदमी के हाथ में मोबाइल होता है। लोग विदेशों में बैठे अपने दोस्तों-रिश्तेदारों से वीडियो कॉल पर बात करते हैं। हरीश साल्वे जैसे देश के सबसे बड़े वकीलों ने बेहद महत्त्वपूर्ण मामलों में ऑनलाइन सुनवाई में भाग लेकर देश का प्रतिनिधित्व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर किया है। विभिन्न अदालतों में अपराधियों की सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हो रही है। ऐसे में क्या परिवार अदालतों में ऑनलाइन सुनवाई नहीं हो सकती? 


अतुल सुभाष अपनी कंपनी से छुट्टी लेकर बार-बार यूपी के जौनपुर अदालत में चक्कर काटते-काटते तंग आ चुका था। उसने परेशान होकर आत्महत्या कर ली। क्या यदि उसे ऑनलाइन सुनवाई के माध्यम से अदालत में पेश होने का अवसर मिलता तो शायद अतुल सुभाष की जान बच जाती। उन्होंने कहा कि केंद्र-राज्य सरकारों और सर्वोच्च न्यायालय को इसके बारे में विचार करना चाहिए। 


ऐसे केस लंबे क्यों चलें? 

अश्विनी कुमार दुबे ने कहा कि विवाह और तलाक के मामले इतने लंबे चलते हैं कि न्याय पाने की प्रक्रिया ही दंड बन जाती है। यदि अतुल सुभाष जैसे जवानों को यह पता हो कि उनके मामले का न्याय एक या दो वर्ष के अंदर आ जाएगा तो वे कभी भी कोई गलत कदम नहीं उठाएंगे। लेकिन इसके लिए अदालतों और वकीलों को अपनी ओर से पहल करनी होगी। इस तरह के मामलों को टाइम बाउंड कर दिया जाना चाहिए। 


बिना जांच के केस नहीं

वरिष्ठ वकील आभा सिंह ने कहा कि अदालतों में जज से लेकर वकील तक सभी यह जानते हैं, और मानते हैं कि दहेज उत्पीड़न के ज्यादातर मामले फर्जी होते हैं। ये वर पक्ष से अवैध तरीके से पैसा वसूलने के लिए लगाए जाते हैं। केस को लंबा चलाकर वर पक्ष को मनमाने सौदे पर सहमत होने के लिए मजबूर किया जाता है। उन्होंने कहा कि इस तरह के मामलों में केस चलाने का अधिकार दरोगा स्तर से ऊपर के अधिकारी को ही करना चाहिए। निचले स्तर की पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण ऊपरी स्तर से जांच होने पर फर्जी केस होने बंद हो जाएंगे। साथ ही, फर्जी केस दायर करने पर पति हो या पत्नी, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। 


जेंडर न्यूट्रल बने कानून

अश्विनी कुमार दुबे ने कहा कि जब दहेज उत्पीड़न का एक्ट बनाया गया था, तब का समाज अलग था। लेकिन आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे निकल रही हैं और पुरुषों को हर क्षेत्र में चुनौती दे रही हैं। कई जगह महिलाएं स्वयं जेंडर न्यूट्रल होने की मांग करती हैं और इसके लिए बाकायदा लड़ाई लड़ती हैं। ऐसे में दहेज उत्पीड़न जैसे मामले एक तरफा महिलाओं के पक्ष में क्यों होने चाहिए? 


देखा यही जाता है कि महिलाएं दहेज उत्पीड़न कानून का गलत लाभ उठाकर पति को प्रताड़ित करती हैं, या अपनी मनमानी करती हैं। पति उनकी मनमानी के खिलाफ आवाज उठाए तो उसे फर्जी केस में फंसाने की धमकी दी जाती है। ऐसे में समय के बदलाव को देखते हुए पति के लिए भी तलाक लेना उतना ही आसान होना चाहिए जितना कि पत्नी के लिए। हमें समझना होगा कि विवाह जबरदस्ती चलने वाली संस्था नहीं है। यदि दोनों आपसी सहमति से साथ रहते हैं तो यह बहुत अच्छा है, लेकिन तलाक लेने को कठिन बनाकर दोनों को मजबूर करके साथ रखने की सोच छोड़नी चाहिए। तलाक प्रक्रिया आसान बनानी चाहिए। 
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गिरफ्तारी न बने हथियार

दहेज उत्पीड़न के मामलों में पति के परिवार को गिरफ्तार होना पड़ जाता है जो इस कानून की सबसे बड़ी खामी है। फर्जी मामला होने पर भी पति का पूरा परिवार जेल चला जाता है। यदि आरोप सिद्ध होने पर सजा होने का बदलाव हो तो यह कानून किसी के लिए हथियार नहीं रह जाएगा। 


केवल पत्नी की सहूलियत क्यों

आभा सिंह ने कहा कि हर मामले में केवल महिलाओं की सुविधा ही क्यों देखी जानी चाहिए। महिलाएं इस मामले में कहीं से भी केस दर्ज करा सकती हैं। लेकिन यह नहीं होना चाहिए। केस दर्ज करने का अर्थ न्याय देना होता है, किसी निर्दोष को सजा देना नहीं। यदि अतुल सुभाष और उसकी पत्नी दोनों बंगलूरू में रहते थे तो केस जौनपुर क्यों चलना चाहिए। केस चलाने की अदालत का चयन दोनों की सुविधा का ध्यान रखकर करना चाहिए। 


बच्चों पर पति-पत्नी का समान अधिकार क्यों नहीं

इस तरह के मामलों में महिलाएं बच्चों को धन उगाही का हथियार बना लेती हैं। पति को बच्चों का खर्च तो उठाना होता है, लेकिन पत्नी के न चाहने पर वह उससे मिल नहीं सकता। जबकि सच्चाई यह है कि बच्चों के समुचित विकास के लिए मां-बाप दोनों का प्यार मिलना आवश्यक होता है। लेकिन दुर्भाग्य है कि इस मामले में अदालतों का रुख भी बहुत कमजोर होता है। वे भी आगे बढ़कर केवल बच्चे के हित को ध्यान में रखकर पति-पत्नी को एक समान अधिकार नहीं देतीं। यदि जिला अदालतें, परिवार अदालतें ही अपने स्तर पर चाहें तो पति-पत्नी को बच्चों के मामले में एक समान अधिकार देकर बड़ी मनमानी को खत्म कर सकती हैं।


आभा सिंह ने कहा कि मुंबई के एक फिल्म निर्देशक अपने बच्चों के खर्च के रूप में अपनी पत्नी को हर महीने भारी रकम चुका रहा है। लेकिन इसके बाद भी पिछले चार साल से पत्नी ने उसे उसी के बच्चों से नहीं मिलने दिया है। यहां तक कि अदालत से आदेश होने के बाद भी महिला कभी अपना पता बदलकर तो कभी किसी अन्य रूप में पिता के सामने बच्चों को लाने से बच निकलती है। यह सीधे-सीधे कानून के दुरुपयोग का मामला है, लेकिन अदालतें महिलाओं के प्रति कोई कड़ा कदम उठाने से बचती हैं। समय को देखते हुए अब इस तरह के रुख में बदलाव किया जाना चाहिए।


जिला अदालतों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर लगे रोक

आभा सिंह ने कहा कि यह बहुत सामान्य और सर्वविदित जानकारी है कि जिला अदालतों में भ्रष्टाचार हो रहा है। इसमें पुलिस और वकीलों से लेकर जज तक भी शामिल होते हैं। अतुल सुभाष ने स्पष्ट रूप से जज पर आरोप लगाए हैं। ऐसे उदाहरणों को देखते हुए यह साफ होना चाहिए कि यदि जज भी भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाए तो उस पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। 
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