बता दें कि मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के 30 जुलाई के आदेश के खिलाफ नौ महिला वकीलों ने अपील दायर कर इस पर रोक लगाने का अनुरोध किया था। अपील में कहा गया था कि देशभर की अदालतों को इस तरह की शर्तें लगाने से रोकना चाहिए, क्योंकि यह कानून के सिद्धांतों के विपरीत हैं।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में आरोपी को जमानत देते हुए यह शर्त लगाई थी कि वह अपनी पत्नी के साथ पीड़ित के घर जाएगा और उससे अपने हाथ पर राखी बांधने का अनुरोध करते हुए हमेशा सुरक्षा करने का वादा करेगा।
वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्मय से हुई इस मामले की सुनवाई में वेणुगोपाल ने उच्च न्यायालय के आदेश का जिक्र किया और कहा कि जहां तक पेश मामले का संबंध है तो ऐसा लगता है कि वे भावावेष में आ गए। पहले से ही इस बारे में न्यायालय के फैसले हैं कि न्यायाधीशों को पेश मामले, विशेषकर जमानत की शर्तों के बारे में, खुद को तथ्यों तक सीमित रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि न्यायिक अकादमी में शीर्ष अदालत के फैसले पढ़ाने चाहिए और उन्हें निचली अदालतों तथा उच्च न्यायालयों के समक्ष रखा जाना चाहिए ताकि न्यायाधीशों को पता रहे कि क्या करने की आवश्कता है। पीठ ने अटार्नी जनरल से कहा कि क्या वह इस बारे में एक संक्षिप्त नोट दे सकते हैं।
पीठ ने कहा कि जमानत की शर्तों में विवेकाधिकार में यह देखने की आवश्यकता है कि किस बात की अनुमति है और किसकी नहीं है। यह काम करने का एक तरीका है। फैसले में हम कह सकते हैं कि क्या करने की आवश्यकता है।
अधिवक्ता अपर्णा भट सहित याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने कहा कि अटार्नी जनरल के सुझाव के अनुरूप वे अपना नोट दे सकते हैं। पीठ ने कहा कि एक नोट दीजिए कि क्या किया जा सकता है और क्या नहीं। अटार्नी जनरल, याचिकाकर्ता और हस्तक्षेप के आवेदनकर्ता नोट दाखिल कर सकते हैं। इसे तीन सप्ताह बाद 27 नवंबर को सूचीबद्ध किया जाए।
न्यायालय ने 16 अक्तूबर को अटॉर्नी जनरल से इस मामले में सहयोग का अनुरोध किया था, जिसमें छेड़छाड़ के एक मामले में आरोपी को शिकायकर्ता से राखी बंधवाने की शर्त पर जमानत दिए जाने के मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के 30 जुलाई के आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने कहा था कि यह कानून के सिद्धांतों के खिलाफ हैं। इस प्रकार की शर्तों से पीड़ित की परेशानी महत्वहीन बन जाती है।