अक्सर देखा जाता है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में रैलियों-सभाओं में लोकनृत्यों, कलाकारों, गायकों को बुलाया जाता है। इसका मकसद है रैली में आई भीड़ का मनोरंजन करना। लेकिन इनके जीवन की क्या हालत है इससे शायद ही किसी को मतलब रहता हो। रैली खत्म होते ही इन्हें भी भुला दिया जाता है।
मध्यप्रदेश, छत्तीगसढ़ जैसे राज्यों में लोकगायकों, लोकनृत्यों की भरमार है। लेकिन इन्हें किसी तरह का रोजगार नसीब नहीं है। इनकी याद सिर्फ चुनावों के दौरान ही आती है। हालांकि चुनावों के दिनों में ये कलाकार थोड़ी बहुत कमाई कर लेते हैं, लेकिन बाकी समय में इनमें से अधिकतर को शायद ही कोई पूछता है।
रैलियों-जनसभाओं के बाद इन्हें भुला दिया जाता है। सरकार की उदासीनता की वजह से इनकी ये स्थिति है। अगर लोकगायकों, कलाकारों, शिल्पकारों के लिए सरकार योजनाओं का सही कार्यान्वय करे तो इनकी स्थिति में सुधार आ सकता है। इसके लिए सरकार को नए कार्यक्रम शुरू करने होंगे। कुछ ऐसे कोर्स शुरू करने होंगे जिससे इसमें करियर के प्रति लोगों में रुझान पैदा हो।