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विधानसभा चुनावः एंटी-इंकंबेसी को नहीं हरा पाए फ्री फोन, गैस, बिजली और शौचालय

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 12 Dec 2018 02:57 PM IST
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मोदी सरकार की ग्रामीणों के लिए शुरू की गई योजनाएं

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों में जिस तरह से मतदाताओं ने भाजपा को नकारा है, उससे लगता है कि सरकार की उपलब्धियां धरातल तक ही नहीं पहुंच पाईं। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में एंटी-इंकंबेसी को खत्म करने के लिए भाजपा ने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी थी। सरकार ने एंटी-इंकंबेसी के इलाज के लिए फ्री में फोन बांटने से लेकर, रथयात्रा निकालने, सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से सीधे संवाद, आयुष्मान भारत बीमा योजना और यहां तक कि संघ प्रचारकों की फौज को मैदान में उतारा दिया था, लेकिन एंटी-इंकंबेसी से मुकाबला नहीं कर पाई। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार इलाज तो करती रही लेकिन मर्ज नहीं समझ पाई।

ग्राम स्वराज अभियान से नहीं मिला सहारा

सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम उठाए, लेकिन वे नाकाफी साबित हुए। सरकार ने ग्राम स्वराज अभियान दो चरणों में शुरू किया, जिसमें देश के 49 हजार गांवों तक सरकार की प्रमुख 7 योजनाओं को पहुचंना लक्ष्य था, वहीं तीनों राज्यों में इसकी सफलता का आंकड़ा 100 फीसदी के आसपास रहा। बावजूद इसके सरकार के इन कदमों से जनता खुश नहीं हुई।

गांवों में नहीं बढ़ी आय

प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव का कहना है कि सरकार एंटी-इंकंबेसी का इलाज तो करने में जुटी रही, लेकिन मर्ज का पता लगाना भूल गई। वे कहते हैं कि सरकार ने तमाम उपाय तो किए लेकिन ग्रामीणों की स्थिर और न बढ़ने वाली आय ने पानी फेर दिया। वे कहते हैं कि सरकार ने एमएसपी तो लागू की, लेकिन उस रेट पर खरीद नहीं हुई, जिससे उनकी आय में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। वह कहते हैं कि इन तीनों राज्यों में 2014-15 और 2015-16 में पहले सूखा पड़ा, उसके बाद फसलों के दाम क्रेश कर गए और जब थोड़ा उबरने की कोशिश की तो नोटबंदी ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी।

उत्पादन और उपभोक्ता केन्द्रित हैं स्कीम्स

यादव के मुताबिक सरकार केवल कागज पर घोषणाएं करती है, लेकिन असलियत में नहीं उतार पाए। वे कहते हैं कि सरकार की किसान संबंधित सभी योजनाएं उत्पादक केन्द्रित होने की बजाय उत्पादन केन्द्रित हैं। वह कहते हैं कि वर्तमान में सरकार की योजनाएं उत्पादन और उपभोक्ता केन्द्रित हैं। वह कहते हैं कि इन योजनाओं का लाभ किसानों को मिलने की बजाय व्यापारी को हो रहा है।

सुविधाओं के होने पर भी निराश हैं लोग

आय में कम वृद्धि के अलावा किसानों को व्यापार में भी घाटा झेलना पड़ा है। केवल किसान ही नहीं बल्कि मार्केट को भी घाटे का सामना करना पड़ा है। साल 2014-15 से पहले कृषि और गैर कृषि व्यावसाय में सामन्यता 5.2 फीसदी वार्षिक वृद्धि हो रही थी। यह आंकड़ा 4.9 फीसदी से थोड़ा अधिक है। जो दर्शाता है कि आय में स्थिरता बनी हुई है। इसके पीछे भी कई कारण हो सकते हैं। जैसे फसल का कम दाम और कृषि श्रम में कमी आना। वहीं सुस्त अर्थव्यवस्था के बाद से रोजगार में भी कमी आई है। ये हालात नोटबंदी के बाद और भी खराब हो गए। मार्केट के गिरने का असर रोजगार पर पड़ा और बेरोजगारी में बढ़ोतरी हुई।

फसल की कीमतें गिरने से लोगों की आय कम हुई है। जिसके बाद सरकार की ग्रामीणों के लिए लांच की गई इन सुविधाओं के बाद भी सत्ता में बैठी भाजपा को वोट नहीं मिल पाए। गरीब ग्रामीण परिवारों को मुफ्त बिजली और एलपीजी उपलब्ध कराई गई थी। लेकिन बिना नौकरी और बिना आय के बिजली का बिल भर पाना और सिलेंडर को भरवाना काफी मश्किल होता है। इन सुविधाओं के बदले लोगों को भुगतान भी करना पड़ता है, लेकिन जब आय ही नहीं होगी तो वह भुगतान कैसे करेंगे।

ग्रामीण इलाकों के लिए मोदी सरकार की बड़ी योजनाएं

प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण

ग्रामीण इलाकों में इस सरकारी योजना के तहत बड़ी संख्या में घर बनवाए गए। प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत बीते तीन वित्तीय वर्षों में 1 करोड़ घरों का निर्माण किया गया। जिनमें से सबसे अधिक 27 फीसदी मध्यप्रदेश में बनाए गए। यहां 15.43 लाख घरों का निर्माण कराया गया। इसके अलावा छत्तीसगढ़ में 5.99 लाख और राजस्थान में 5.96 लाख घरों का निर्माण कराया गया। इन तीनों राज्यों में ही भाजपा को बड़ी हार का सामना करना पड़ा है।

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मोदी सरकार की ग्रामीणों के लिए शुरू की गई योजनाएं
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों में जिस तरह से मतदाताओं ने भाजपा को नकारा है, उससे लगता है कि सरकार की उपलब्धियां धरातल तक ही नहीं पहुंच पाईं। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में एंटी-इंकंबेसी को खत्म करने के लिए भाजपा ने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी थी। सरकार ने एंटी-इंकंबेसी के इलाज के लिए फ्री में फोन बांटने से लेकर, रथयात्रा निकालने, सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से सीधे संवाद, आयुष्मान भारत बीमा योजना और यहां तक कि संघ प्रचारकों की फौज को मैदान में उतारा दिया था, लेकिन एंटी-इंकंबेसी से मुकाबला नहीं कर पाई। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार इलाज तो करती रही लेकिन मर्ज नहीं समझ पाई।

ग्राम स्वराज अभियान से नहीं मिला सहारा

सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम उठाए, लेकिन वे नाकाफी साबित हुए। सरकार ने ग्राम स्वराज अभियान दो चरणों में शुरू किया, जिसमें देश के 49 हजार गांवों तक सरकार की प्रमुख 7 योजनाओं को पहुचंना लक्ष्य था, वहीं तीनों राज्यों में इसकी सफलता का आंकड़ा 100 फीसदी के आसपास रहा। बावजूद इसके सरकार के इन कदमों से जनता खुश नहीं हुई।

गांवों में नहीं बढ़ी आय

प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव का कहना है कि सरकार एंटी-इंकंबेसी का इलाज तो करने में जुटी रही, लेकिन मर्ज का पता लगाना भूल गई। वे कहते हैं कि सरकार ने तमाम उपाय तो किए लेकिन ग्रामीणों की स्थिर और न बढ़ने वाली आय ने पानी फेर दिया। वे कहते हैं कि सरकार ने एमएसपी तो लागू की, लेकिन उस रेट पर खरीद नहीं हुई, जिससे उनकी आय में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। वह कहते हैं कि इन तीनों राज्यों में 2014-15 और 2015-16 में पहले सूखा पड़ा, उसके बाद फसलों के दाम क्रेश कर गए और जब थोड़ा उबरने की कोशिश की तो नोटबंदी ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी।

उत्पादन और उपभोक्ता केन्द्रित हैं स्कीम्स

यादव के मुताबिक सरकार केवल कागज पर घोषणाएं करती है, लेकिन असलियत में नहीं उतार पाए। वे कहते हैं कि सरकार की किसान संबंधित सभी योजनाएं उत्पादक केन्द्रित होने की बजाय उत्पादन केन्द्रित हैं। वह कहते हैं कि वर्तमान में सरकार की योजनाएं उत्पादन और उपभोक्ता केन्द्रित हैं। वह कहते हैं कि इन योजनाओं का लाभ किसानों को मिलने की बजाय व्यापारी को हो रहा है।

सुविधाओं के होने पर भी निराश हैं लोग

आय में कम वृद्धि के अलावा किसानों को व्यापार में भी घाटा झेलना पड़ा है। केवल किसान ही नहीं बल्कि मार्केट को भी घाटे का सामना करना पड़ा है। साल 2014-15 से पहले कृषि और गैर कृषि व्यावसाय में सामन्यता 5.2 फीसदी वार्षिक वृद्धि हो रही थी। यह आंकड़ा 4.9 फीसदी से थोड़ा अधिक है। जो दर्शाता है कि आय में स्थिरता बनी हुई है। इसके पीछे भी कई कारण हो सकते हैं। जैसे फसल का कम दाम और कृषि श्रम में कमी आना। वहीं सुस्त अर्थव्यवस्था के बाद से रोजगार में भी कमी आई है। ये हालात नोटबंदी के बाद और भी खराब हो गए। मार्केट के गिरने का असर रोजगार पर पड़ा और बेरोजगारी में बढ़ोतरी हुई।

फसल की कीमतें गिरने से लोगों की आय कम हुई है। जिसके बाद सरकार की ग्रामीणों के लिए लांच की गई इन सुविधाओं के बाद भी सत्ता में बैठी भाजपा को वोट नहीं मिल पाए। गरीब ग्रामीण परिवारों को मुफ्त बिजली और एलपीजी उपलब्ध कराई गई थी। लेकिन बिना नौकरी और बिना आय के बिजली का बिल भर पाना और सिलेंडर को भरवाना काफी मश्किल होता है। इन सुविधाओं के बदले लोगों को भुगतान भी करना पड़ता है, लेकिन जब आय ही नहीं होगी तो वह भुगतान कैसे करेंगे।

ग्रामीण इलाकों के लिए मोदी सरकार की बड़ी योजनाएं

प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण

ग्रामीण इलाकों में इस सरकारी योजना के तहत बड़ी संख्या में घर बनवाए गए। प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत बीते तीन वित्तीय वर्षों में 1 करोड़ घरों का निर्माण किया गया। जिनमें से सबसे अधिक 27 फीसदी मध्यप्रदेश में बनाए गए। यहां 15.43 लाख घरों का निर्माण कराया गया। इसके अलावा छत्तीसगढ़ में 5.99 लाख और राजस्थान में 5.96 लाख घरों का निर्माण कराया गया। इन तीनों राज्यों में ही भाजपा को बड़ी हार का सामना करना पड़ा है।

घर-घर तक बिजली पहुंचाना

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रधानमंत्री उज्जवला योजना

प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत जून, 2015 तक 15.33 करोड़ घरों तक एलपीजी गैस कनेक्शन पहुंचाया गया। अब अक्तूबर, 2018 में 24.72 करोड़ लोगों को ये सुविधा मिल चुकी है। ये आंकड़ा 57.86 फीसदी से बढ़कर 88.51 पर आ गया है। वहीं अगर इन तीन राज्यों की बात करें तो मध्यप्रदेश में काफी सुधार देखा गया है। यहां घरों तक एलपीजी की पहुंच  39.12 फीसदी से बढ़कर 73.49 फीसदी हुई है। छत्तीसगढ़ में भी पहले  27.63 फीसदी लोगों को ही ये सुविधा प्राप्त थी जो अब 71.23 लोगों को प्राप्त है। वहीं राजस्थान में ये आंकड़ा 58.21 फीसदी से बढ़कर 94.80 फीसदी पर आ गया है।

सौभाग्य योजना

देश के 21.69 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से 20.87 करोड़ यानी 96.24 फीसदी तक अब बिजली की पहुंच है। 25 सितंबर, 2017 को लांच हुई मोदी सरकार की सौभाग्य योजना के अंतर्गत जिन परिवारों तक बिजली की पहुंच नहीं थी, उनका आंकड़ा 4 करोड़ से कम होकर 81.53 लाख पर पहुंच गया है। राज्यों की यहां बात करें तो मध्यप्रदेश में 100 फीसदी और छत्तीसगढ़ में 99.21 फीसदी बिजली पहुंच चुकी है। वहीं राजस्थान में ये आंकड़ा अभी 95.59 फीसदी है।

स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण

2 अक्तूबर, 2014 के बाद से स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण के तहत ग्रामीण भारत के 8.98 करोड़ घरों में शौचालय बनवाए गए हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के 100 फीसदी घरों में शौचालय हैं। इस योजना के लागू होने से पहले ये आंकड़ा मध्यप्रदेश में 27.53 फीसदी, राजस्थान में 29.74 फीसदी और छत्तीसगढ़ में 40.26 फीसदी था।

भारतनेट योजना

देश में गांव-गांव तक इंटरनेट पहुंचाने के उद्देश्य से शुरू हुई इस योजना के तहत भारत की कुल 2.5 लाख ग्राम पंचायतों में से 121,859 में फाइबर केबल बिछाने का काम पूरा हो चुका है। वहीं 116,492 ग्राम पंचायतों में उपकरणों के इंस्टॉल होने के बाद से पूरी तरह ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी आ चुकी है।

बैंक खाते खुलवाना

जन धन योजना

प्रधानमंत्री जनधन योजना

प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत 33.38 करोड़ बैंक खाते खोले गए। जिनमें से 19.75 करोड़ ग्रामीणों के हैं।

सरकार की इन योजनाओं से हुए विकास का फायदा तो ग्रामीण इलाकों को हुआ। लेकिन विधानसभा चुनावों के नतीजे बताते हैं कि जनता केवल इन योजनाओं से खुश नहीं है। इसमें सबसे बड़ा कारण है कम और स्थिर आय। वहीं एक अन्य कारण है फसलों के कम दाम।

साल 2014-15 में थोक मूल्य सूचकांक में औसत वार्षिक वृद्धि खाद्य पदार्थों में 2.75 फीसदी और अखाद्य कृषि उत्पाद में 0.76 फीसदी थी। यह आंकड़ा यूपीए सरकार के कार्यकाल के आंकड़े से काफी कम है। यूपीए सरकार के पांच साल के कार्यकाल के दौरान थोक मूल्य सूचकांक में औसत वार्षिक वृद्धि खाद्य पदार्थों में 12.26 फीसदी और अखाद्य कृषि उत्पाद में 11.04 फीसदी हुई थी।

सड़कों का निर्माण

मोदी सरकार के कार्यकाल में ग्रामीण इलाकों के सड़क निर्माण के आंकड़ों में भी इजाफा हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि न्यूनतम 250 लोगों की जनसंख्या वाली 10.89 फीसदी बस्तियां ऐसी हैं, जहां पक्की सड़कें नहीं हैं। यह आंकड़ा अप्रैल, 2000 में 60.14 फीसदी था। इसी समय अवधि में यह आंकड़ा राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी कम हुआ है। राजस्थान में पहले आंकड़ा 50.04 था जो अब कम होकर 8.54 फीसदी पर आ गया है। वहीं छत्तीसगढ़ में ये आंकड़ा 60.52 फीसदी था जो अब कम होकर 3.98 फीसदी पर आ गया है।
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