पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों में जिस तरह से मतदाताओं ने भाजपा को नकारा है, उससे लगता है कि सरकार की उपलब्धियां धरातल तक ही नहीं पहुंच पाईं। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में एंटी-इंकंबेसी को खत्म करने के लिए भाजपा ने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी थी। सरकार ने एंटी-इंकंबेसी के इलाज के लिए फ्री में फोन बांटने से लेकर, रथयात्रा निकालने, सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से सीधे संवाद, आयुष्मान भारत बीमा योजना और यहां तक कि संघ प्रचारकों की फौज को मैदान में उतारा दिया था, लेकिन एंटी-इंकंबेसी से मुकाबला नहीं कर पाई। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार इलाज तो करती रही लेकिन मर्ज नहीं समझ पाई।
सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम उठाए, लेकिन वे नाकाफी साबित हुए। सरकार ने ग्राम स्वराज अभियान दो चरणों में शुरू किया, जिसमें देश के 49 हजार गांवों तक सरकार की प्रमुख 7 योजनाओं को पहुचंना लक्ष्य था, वहीं तीनों राज्यों में इसकी सफलता का आंकड़ा 100 फीसदी के आसपास रहा। बावजूद इसके सरकार के इन कदमों से जनता खुश नहीं हुई।
प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव का कहना है कि सरकार एंटी-इंकंबेसी का इलाज तो करने में जुटी रही, लेकिन मर्ज का पता लगाना भूल गई। वे कहते हैं कि सरकार ने तमाम उपाय तो किए लेकिन ग्रामीणों की स्थिर और न बढ़ने वाली आय ने पानी फेर दिया। वे कहते हैं कि सरकार ने एमएसपी तो लागू की, लेकिन उस रेट पर खरीद नहीं हुई, जिससे उनकी आय में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। वह कहते हैं कि इन तीनों राज्यों में 2014-15 और 2015-16 में पहले सूखा पड़ा, उसके बाद फसलों के दाम क्रेश कर गए और जब थोड़ा उबरने की कोशिश की तो नोटबंदी ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी।
यादव के मुताबिक सरकार केवल कागज पर घोषणाएं करती है, लेकिन असलियत में नहीं उतार पाए। वे कहते हैं कि सरकार की किसान संबंधित सभी योजनाएं उत्पादक केन्द्रित होने की बजाय उत्पादन केन्द्रित हैं। वह कहते हैं कि वर्तमान में सरकार की योजनाएं उत्पादन और उपभोक्ता केन्द्रित हैं। वह कहते हैं कि इन योजनाओं का लाभ किसानों को मिलने की बजाय व्यापारी को हो रहा है।
आय में कम वृद्धि के अलावा किसानों को व्यापार में भी घाटा झेलना पड़ा है। केवल किसान ही नहीं बल्कि मार्केट को भी घाटे का सामना करना पड़ा है। साल 2014-15 से पहले कृषि और गैर कृषि व्यावसाय में सामन्यता 5.2 फीसदी वार्षिक वृद्धि हो रही थी। यह आंकड़ा 4.9 फीसदी से थोड़ा अधिक है। जो दर्शाता है कि आय में स्थिरता बनी हुई है। इसके पीछे भी कई कारण हो सकते हैं। जैसे फसल का कम दाम और कृषि श्रम में कमी आना। वहीं सुस्त अर्थव्यवस्था के बाद से रोजगार में भी कमी आई है। ये हालात नोटबंदी के बाद और भी खराब हो गए। मार्केट के गिरने का असर रोजगार पर पड़ा और बेरोजगारी में बढ़ोतरी हुई।
फसल की कीमतें गिरने से लोगों की आय कम हुई है। जिसके बाद सरकार की ग्रामीणों के लिए लांच की गई इन सुविधाओं के बाद भी सत्ता में बैठी भाजपा को वोट नहीं मिल पाए। गरीब ग्रामीण परिवारों को मुफ्त बिजली और एलपीजी उपलब्ध कराई गई थी। लेकिन बिना नौकरी और बिना आय के बिजली का बिल भर पाना और सिलेंडर को भरवाना काफी मश्किल होता है। इन सुविधाओं के बदले लोगों को भुगतान भी करना पड़ता है, लेकिन जब आय ही नहीं होगी तो वह भुगतान कैसे करेंगे।
ग्रामीण इलाकों में इस सरकारी योजना के तहत बड़ी संख्या में घर बनवाए गए। प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत बीते तीन वित्तीय वर्षों में 1 करोड़ घरों का निर्माण किया गया। जिनमें से सबसे अधिक 27 फीसदी मध्यप्रदेश में बनाए गए। यहां 15.43 लाख घरों का निर्माण कराया गया। इसके अलावा छत्तीसगढ़ में 5.99 लाख और राजस्थान में 5.96 लाख घरों का निर्माण कराया गया। इन तीनों राज्यों में ही भाजपा को बड़ी हार का सामना करना पड़ा है।
सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम उठाए, लेकिन वे नाकाफी साबित हुए। सरकार ने ग्राम स्वराज अभियान दो चरणों में शुरू किया, जिसमें देश के 49 हजार गांवों तक सरकार की प्रमुख 7 योजनाओं को पहुचंना लक्ष्य था, वहीं तीनों राज्यों में इसकी सफलता का आंकड़ा 100 फीसदी के आसपास रहा। बावजूद इसके सरकार के इन कदमों से जनता खुश नहीं हुई।
यादव के मुताबिक सरकार केवल कागज पर घोषणाएं करती है, लेकिन असलियत में नहीं उतार पाए। वे कहते हैं कि सरकार की किसान संबंधित सभी योजनाएं उत्पादक केन्द्रित होने की बजाय उत्पादन केन्द्रित हैं। वह कहते हैं कि वर्तमान में सरकार की योजनाएं उत्पादन और उपभोक्ता केन्द्रित हैं। वह कहते हैं कि इन योजनाओं का लाभ किसानों को मिलने की बजाय व्यापारी को हो रहा है।