बंगाल में चुनाव से ठीक पहले हुईं सांप्रदायिक घटनाओं ने यह बहस भी तेज कर दी है कि 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद क्या सांप्रदायिक तनाव और टकराव की घटनाएं बढ़ी हैं। बंगाल में कुछ वर्षों में खासकर रामनवमी के दौरान हावड़ा, कोलकाता, मुर्शिदाबाद और अन्य जिलों में यह पैटर्न उभरा है...या तो जुलूस की अनुमति को लेकर विवाद होता है, या जुलूस निकलने पर टकराव और हिंसा की घटनाएं सामने आती हैं।
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इस बार भी रामनवमी पर कई जगह जुलूस पर हमले और विरोध की खबरें आईं। कई मामलों में आयोजकों को अनुमति के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा, जिसके बाद कोर्ट के निर्देश पर जुलूस निकाले गए। विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल में त्योहार आस्था और संस्कृति के साथ राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन और ध्रुवीकरण के माध्यम भी बनते जा रहे हैं। त्योहार और सियासत के बीच की रेखा लगातार धुंधली हो रही है।
लगातार बढ़ रहीं सांप्रदायिक घटनाएं
2011 से पहले राजनीतिक हिंसा जरूर होती थी, लेकिन बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक टकराव कम होते थे। 2011 के बाद रामनवमी जैसे जुलूसों का आकार और सियासी महत्व बढ़ा। प्रशासनिक अनुमति, रूट और समय को लेकर विवाद हुए और स्थानीय घटनाएं तेजी से सांप्रदायिक रंग लेने लगीं।
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- वर्ष 2014 से 2016 के बीच हिंसा की छिटपुट घटनाएं सामने आईं लेकिन, जुलूसों की संख्या और उनमें लोगों की भागीदारी में काफी इजाफा हुआ। साल 2016 से 2018 के बीच रामनवमी और हनुमान जयंती के त्योहार के दौरान कई जिलों में हिंसा की घटनाएं हुईं।
- वर्ष 2018 में आसनसोल, रानीगंज, पुरुलिया, कांकिनारा में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई, जिनमें कम से कम तीन लोगों की मौत हुई। 2023 में हावड़ा समेत कई इलाकों में हिंसा हुई। इनमें तीन लोगों की जान गई। वहीं, 2024 में मुर्शिदाबाद में जुलूस पर बमबाजी में 20 लोग घायल हुए।