भारतीय जनता पार्टी
भाजपा जिस छत्तीसगढ़ में जीत को लेकर आश्वस्त थी वहां गुटबाजी ने उसके माथे पर पसीना ला दिया है। राजस्थान में पार्टी उपाध्यक्ष भूपेन्द्र यादव, ओम माथुर, मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, केन्द्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल समेत अन्य में जोरदार ठनी थी। वसुंधरा राजे अपने हिसाब से राजस्थान की सरकार चला रही थी। लेकिन धीरे-धीरे सतह पर आई कलह कम हुई है। अब थोड़ा सुधार दिखने लगा है। वहीं मध्य प्रदेश में जहां सब लगभग ठीक था, वहां उठा-पटक बढ़ रही है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तथा कई मंत्रियों में खटपट दिखाई देने लगी है। जबकि तीनों राज्यों का चुनाव भाजपा के लिए नाक का सवाल है।
कांग्रेस
ऐसी ही स्थिति कांग्रेस के लिए भी है। छत्तीसगढ़ में गुटबाजी की आशंका को देखकर कांग्रेस ने ताम्रध्वज साहू को लगाया। पार्टी के छत्तीसगढ़ प्रभारी पीएल पूनिया और अन्य ने भी अपनी सक्रियता बढ़ाई। इसी तरह से मध्य प्रदेश और राजस्थान में राहुल गांधी ने सभी शीर्ष नेताओं को केवल अपने राज्य में जनाधार बढ़ाने, वहां विधानसभा चुनाव में जीत सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंप दी।
म.प्र. में कमल नाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के कंधे पर खास तौर से जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन टिकट बंटवारे की बैठक के दौरान दिग्विजय सिंह के साथ सिंधिया का झगड़ा सतह पर आ गया। यही स्थिति राजस्थान में देखने को मिल रही है। सीपी जोशी, गिरजा व्यास, सचिन पायलट, अविनाश पांडे सब की निगाह राजस्थान पर टिकाई गई।
पार्टी महासचिव अशोक गहलोत को भी राजस्थान में मजबूत सरकार की वापसी में प्रयास का जिम्मा सौंपते हुए प्रचार अभियान समिति का प्रमुख बनाया गया, लेकिन बताते हैं राज्य में गुटबाजी की तलवारें अब भी खिंची हुई है। यह स्थिति तब है, जब चुनाव प्रचार अब धीरे-धीरे मतदान की तरफ बढ़ रहा है।