पूर्वोत्तर का द्वार कहे जाने वाला असम उत्तर भारत की सियासत के सामने एक बड़ी नजीर पेश कर रहा है। यहां की राजनीति में उत्तर भारत की तरह जाति की जकड़न नहीं है और यहां असम अस्मिता का जज्बा हावी है।
हिंदू हों या असमिया मुस्लिम, सब असम की अस्मिता से जुड़े हैं। असम की सोच में आया ये बदलाव छात्र आंदोलन की वजह से है। असम के राजनीतिक शिखर पर आज जितने भी चमकते चेहरे हैं, वे सब छात्र राजनीति से निकले हुए हैं।
भाजपा के सर्वानंद सोनोवाल हों या हेमंत विश्व शर्मा दोनों ही छात्र संगठन आसू से निकले हुए हैं। वहीं, असम गण परिषद का पूरा नेतृत्व आसू से तैयार हुआ है। हालांकि यहां की कुछ मूल जनजातियों बोडो-राभा, मिसी, कारबी और दिमसार के बीच आपसी संघर्ष है, लेकिन वह भी उनकी वर्चस्व की लड़ाई से जुड़ा है।