सार
इस बार दिसपुर विधानसभा सीट की लड़ाई भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं, बल्कि पुरानी भाजपा बनाम नई भाजपा और बागियों के खिलाफ संगठन की है। भाजपा की मजबूत पकड़ वाले इस गढ़ में अब मुकाबला कठिन, क्योंकि मीरा बरठाकुर गोस्वामी कांग्रेस से, प्रद्योत बरदलोई भाजपा से और जयंत कुमार दास निर्दलीय मैदान में हैं।
विधानसभा चुनाव में इस बार चर्चा मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की सीट जालुकबारी की नहीं, बल्कि दिसपुर की है-जहां मुकाबला सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं, बल्कि पुरानी भाजपा बनाम नई भाजपा और बागी बनाम संगठन के बीच होता दिख रहा है। पिछले दो चुनावों में भारी जीत के साथ दिसपुर सीट को अपने मजबूत गढ़ में बदल चुकी भाजपा के लिए मुकाबला आसान नहीं दिख रहा क्योंकि राजनीतिक समीकरण पूरी तरह उलट गए हैं।
मीरा बरठाकुर गोस्वामी, जो पहले भाजपा में थीं, अब कांग्रेस उम्मीदवार हैं। वहीं प्रद्योत बरदलोई , जो कांग्रेस से सांसद रहे, अब भाजपा से ताल ठोक रहे हैं। इसके अलावा भाजपा के पुराने नेता जयंत कुमार दास टिकट न मिलने पर निर्दलीय मैदान में उतर चुके हैं। यानी इस बार लड़ाई वफादारी, दलबदल व असंतोष की कई परतों के बीच लड़ी जा रही है। दास ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है।
मजबूत आंकड़ों के बावजूद भाजपा के लिए अनिश्चितता
दिसपुर सीट 2021 में भाजपा 1.30 लाख से ज्यादा वोटों से जीती थी। 2016 में भी उसे यहां जीत मिली थी। स्थानीय वोटर रंजना कहती हैं, आंकड़े भाजपा के साथ हैं, पर जमीन पर समीकरण बदल रहे हैं।
मास्टरस्ट्रोक या जोखिम
चुनाव से ठीक पूर्व भाजपा ने प्रद्योत को पार्टी में शामिल कर प्रत्याशी बनाया और मौजूदा विधायक का टिकट काट दिया। यह फैसला मास्टरस्ट्रोक हो सकता था, पर पार्टी में असंतोष खुलकर सामने आने से यह जोखिम बनता दिख रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, साइलेंट वोटर इस बार निर्णायक हो सकते हंै, जो आखिरी समय में पूरा समीकरण बदल सकते है।