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असम विधानसभा चुनाव: बीटीसी चुनाव में भाजपा-बीपीएफ के तलाक की लिखी जा चुकी थी पटकथा

Tue, 02 Mar 2021 05:22 AM IST
देव कश्यप हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली

सार

  • भाजपा ने अपने सहयोगी के खिलाफ ही लड़ा था चुनाव, यूपीपीएल को साथ लाकर किया हिसाब बराबर।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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असम विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा और बोडोलैंड पीपुल्स पार्टी (बीपीएफ) के बीच हुआ सियासी तलाक अप्रत्याशित नहीं है। इसकी पटकथा बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) के चुनाव में ही लिखी जा चुकी थी। बोडो समुदाय में पैठ बनाने के लिए भाजपा ने न सिर्फ सहयोगी दल बीपीएफ के खिलाफ चुनाव लड़ा, बल्कि बीपीएफ की प्रतिद्वंद्वी यूपीपीएल के साथ बीटीसी पर कब्जा भी किया।

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असम के जिन चार जिलों को मिलाकर बीटीसी का गठन किया गया, उन चार जिलों की 12 सीटों में से एक पर भी भाजपा पिछले चुनाव में जीत हासिल नहीं कर पाई थी। इसके बाद पार्टी ने बोडो समुदाय में अपनी पकड़ बनाने के लिए बीते साल दिसंबर में हुए बीटीसी चुनाव में अपने दम पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। भाजपा इस चुनाव में नौ सीटें जीतने में कामयाब हुई और बीपीएफ की प्रतिद्वंद्वी यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) (12 सीट) के साथ सत्ता में आई। भाजपा के इस फैसले के कारण 17 साल बाद बीपीएफ का बीटीसी पर वर्चस्व खत्म हो गया। बीपीएफ बहुमत से चार सीट दूर रह गई।
 


बनाए नए सहयोगी
पिछले विधानसभा चुनाव में बीपीएफ एनडीए के साथ थी, जबकि यूपीपीएल कांग्रेस गठबंधन के साथ। अब यूपीपीएल एनडीए में है तो बीपीएफ कांग्रेस गठबंधन के साथ। बोडो प्रभुत्व वाले चार जिलों में सियासी घाटे को पाटने के लिए भाजपा ने यूपीपीएल के अलावा गण सुरक्षा पार्टी (जीएसपी) को भी साधा है। इन दोनों दलों का बोडो बाहुल्य क्षेत्र में प्रभाव है।

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तलाक महज औपचारिकता
बीटीसी में भाजपा और यूपीपीएल के बीच समझौते के साथ ही भाजपा और बीपीएफ के संबंध महज औपचारिक थे। बीटीसी की सत्ता से हाथ धोने के बाद बीपीएफ और भाजपा के बीच संबंध सामान्य नहीं रह गए थे। बीपीएफ लगातार भाजपा पर हमलावर थी। बीपीएफ के भावी रुख को भांपते हुए भाजपा ने बोडो बाहुल्य क्षेत्र में नुकसान की भरपाई के लिए पहले ही यूपीपीएल को साध रखा था।

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