देश की सियासत में इस वक्त शिक्षा का मुद्दा गर्म है। पेपर लीक को लेकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग हो रही है। इसे लेकर संसद मार्च से लेकर पीएम आवास के बाहर प्रदर्शन तक हुआ। बहुत कम मौके ऐसे होते हैं जब देश की सियासत में शिक्षा जैसे मुद्दे पर बात होती है। देश की शिक्षा व्यवस्था पर बात होती है। रोजगार पर बात होती है।
पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था के मुद्दे की बीच ये भी दावा किया गया कि देश का शिक्षा बजट से ज्यादा नीट का एक पेपर करवाने में खर्च आता है। ऐसे में आइये जानते हैं कि देश का कुल शिक्षा बजट है कितना? बीते 12 साल में इसमें कितना बदलाव आया है? दुनिया के बड़े देशों में शिक्षा का बजट कितना है? हमारे पड़ोसी देश शिक्षा पर कितना खर्च करते हैं?
ताजा विवाद क्या है?
देश में शिक्षा व्यवस्था और नीट परीक्षा विवाद को लेकर विरोध अब सड़क से संसद तक पहुंच गया है। इस मुद्दे चार दिन से संसद ठप है। दूसरी ओर जंतर-मंतर पर चल रहा विरोध प्रदर्शन 20 जुलाई के संसद मार्च और उसमें हुई हिंसा के बाद भी जारी है। प्रदर्शनकारी और विपक्ष दोनों ही शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं। विपक्ष सदन में चर्चा की भी मांग कर रहा है। इसके बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक के मामलों के त्वरित निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का एलान किया है।
शिक्षा बजट बढ़ा, लेकिन हिस्सेदारी घटी
पहली नजर में लगता है कि शिक्षा पर खर्च लगातार बढ़ा है। 2013-14 में शिक्षा (तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय) का बजट 65,867 करोड़ रुपये था, जो 2026-27 में बढ़कर 1,39,289 करोड़ रुपये हो गया। यानी 13 वर्षों में बजट राशि दोगुनी से अधिक हो गई। लेकिन दूसरी ओर, कुल केंद्रीय बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी लगातार घटी है। 2013-14 में यह करीब 4% थी, जबकि 2026-27 में यह घटकर करीब 2.6% रह गई है।
शिक्षा से जुड़ी चुनौती
- फोटो : Amar Ujala
शिक्षा व्यवस्था की प्रमुख चुनौतियां क्या है?
माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर नामांकन कम
- एनईपी का लक्ष्य स्कूल शिक्षा के सभी स्तरों पर 100% सकल नामांकन अनुपात (GER) हासिल करना है। लेकिन 2024-25 में माध्यमिक स्तर पर जीईआर 79% और उच्च माध्यमिक स्तर पर केवल 58% था। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार माध्यमिक स्कूलों की संख्या कम होना और बच्चों का कामकाज में लग जाना इसके प्रमुख कारण हैं।
- रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 तक करीब 10 लाख शिक्षक पद खाली थे। वहीं प्री-प्राइमरी स्तर के 52% शिक्षक पेशेवर रूप से प्रशिक्षित नहीं हैं। अन्य स्तरों पर भी 10% से अधिक शिक्षक आवश्यक पेशेवर योग्यता नहीं रखते।
- रिपोर्ट के अनुसार कई सरकारी स्कूलों में अभी भी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, इंटरनेट, स्मार्ट क्लासरूम और दिव्यांग बच्चों के अनुकूल सुविधाओं की कमी है। सरकार ने डिजिटल शिक्षा पर जोर दिया है, लेकिन स्कूलों में डिजिटल अंतर अब भी बना हुआ है।
उच्च शिक्षा में भी चुनौतियां
एनईपी का लक्ष्य 2030 तक उच्च शिक्षा में 50% जीईआर हासिल करना है, जबकि 2021-22 में यह केवल 28% था। इसके अलावा केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 29% फैकल्टी पद खाली हैं और IIT, IIIT व NIT जैसे संस्थानों में भी बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद रिक्त हैं।
अनुसंधान पर विश्वविद्यालयों की भूमिका सीमित
रिपोर्ट के अनुसार भारत का रिसर्च एंड डेवलपमेंट खर्च जीडीपी का 0.64% है और इसमें विश्वविद्यालयों की हिस्सेदारी केवल 9% है। रिपोर्ट इसे उच्च शिक्षा और शोध क्षेत्र की एक बड़ी चुनौती मानती है।