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अनुच्छेद 370 : जम्मू-कश्मीर में बाजी तो पलट दी, पाकिस्तान भी चुप, मगर जरूरी है लोगों का 'भरोसा' जीतना

Sat, 05 Jun 2021 07:57 PM IST
योगेश साहू जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

संभावित है कि आज हर तरफ जो खामोशी दिखाई पड़ रही है, वह बीच में कभी टूट सकती है। केंद्र सरकार को यहां के लोगों के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर 'भरोसा' बनाना होगा। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने मास्टर स्ट्रोक के जरिए जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म कर दिया। पाकिस्तान को चुप करा दिया गया है यानी सीमा पार से होने वाली फायरिंग अब बंद है। आतंकी घटनाओं में कमी देखने को मिल रही है। उन्हें नई भर्ती के लिए लड़के नहीं मिल रहे। इन सबके बावजूद सरकार पर लोगों का 'भरोसा' नहीं बन पा रहा है।

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जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) का कहना है, दरअसल अब राजनीतिक प्रक्रिया की बहाली में देरी हो रही है। हो सकता है कि चुनाव में दो तीन साल लग जाएं। पहले जनगणना होगी और उसके बाद परिसीमन का कार्य प्रारंभ किया जाएगा। जब ये कार्य पूरे हो जाएंगे तो विधानसभा चुनाव का नंबर आएगा। लोगों में परिसीमन को लेकर शंका है कि इसके जरिए मौजूदा विधानसभा सीटों की संख्या में कोई लंबा चौड़ा विस्तार हो सकेगा। संभावित है कि आज हर तरफ जो खामोशी दिखाई पड़ रही है, वह बीच में कभी टूट सकती है। केंद्र सरकार को यहां के लोगों के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर 'भरोसा' बनाना होगा। 

केंद्र सरकार ने अगस्त 2019 के दौरान जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म करने की घोषणा कर दी थी। इसे मुद्दे पर केंद्र को अंतरराष्ट्रीय जगत के अलावा विपक्ष के सवालों को भी झेलना पड़ा। विदेशी प्रतिनिधिमंडल ने जम्मू-कश्मीर का दौरा किया। लंबे समय तक जम्मू-कश्मीर के लोगों को बंदिशें झेलनी पड़ीं। तमाम विरोध प्रदर्शन या बयानों से परे जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बाजी पलट दी। भाजपा की स्थापना से लेकर अब तक पार्टी के एजेंडे में टॉप पर रहे 'अनुच्छेद 370' को खत्म कर दिया गया। पाकिस्तान ने इस मुद्दे पर अपना मुंह खोलना चाहा।
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सोशल मीडिया पर बयानबाजी भी हुई, लेकिन बाद में उसे शांत करा दिया गया। पाकिस्तान की तरफ से होने वाली गोलीबारी भी पिछले कई माह से बंद है। आतंकियों को नया ठिकाना और साथी नहीं मिल रहे हैं। भाजपा को छोड़कर जम्मू-कश्मीर के दूसरे राजनीतिक दल अब थकान महसूस करने लगे हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के नेता कई तरह के केसों का सामना कर रहे हैं। 

पूर्ण राज्य का दर्जा देने की तरफ बढ़ना चाहिए
कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) का कहना है सरकार को पूर्ण राज्य का दर्जा देने वाली प्रक्रिया की तरफ तेजी से बढ़ना चाहिए। लोगों को सरकार पर भरोसा था कि जल्द ही जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराए जाएंगे, लेकिन अब वह प्रक्रिया दूर जाती दिख रही है। जम्मू-कश्मीर में विधानसभा सीटों के परिसीमन के लिए गठित आयोग का कार्यकाल मार्च 2021 में एक वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया है। केंद्र ने 6 मार्च 2020 को सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में परिसीमन आयोग का गठन किया था।

आयोग की पहली बैठक में नेकां सांसद डॉ. फारूक अब्दुल्ला, हसनैन मसूदी व मोहम्मद अकबर लोन शामिल नहीं हुए। उनका तर्क था कि पार्टी ने राज्य पुनर्गठन अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी है, इस वजह से उनके लिए बैठक में शामिल होना संभव नहीं है। लोगों को सरकार की रणनीति के बारे में कोई जानकारी नहीं है। वे जानना चाहते हैं कि विधानसभा की सीटें कैसे और कहां पर कितनी बढ़ेंगी। 

..तो सात सीटों का इजाफा होगा
केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 7 सीटों का इजाफा होगा। अनुच्छेद 370 खत्म होने से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बन गए हैं। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक के मुताबिक, परिसीमन के बाद 107 सीटों की संख्या 114 हो जाएगी। पिछले चुनाव में वहां पर 87 विधानसभा सीटें रही हैं। इनमें कश्मीर में 46, जम्मू में 37 और लद्दाख में 4 विधानसभा सीटें थी। पीओके के लिए 24 सीटें रिजर्व हैं। 

अभी तक पीओके पाकिस्तान का हिस्सा है। वहां पर अभी चुनाव नहीं कराए जा सकते। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पीओके की 24 सीटों को जोड़कर अभी 111 सीटें हैं। लद्दाख की 4 सीटें हटने के बाद 107 सीटें बचेंगी। परिसीमन के बाद इनकी संख्या बढ़कर 114 हो जाएगी यानी 7 सीटों का इजाफा होगा। यह इजाफा जम्मू की 37 और कश्मीर की 46 सीटों में होगा। अब देखने वाली बात यह है कि किस तरफ नई विधानसभा सीटें आएंगी। 

अनिल गौर कहते हैं, मौजूदा परिस्थितियों में नहीं लगता कि सरकार जम्मू में विधानसभा सीटें बढ़ाएगी। पंचायत चुनाव की बात अलग थी। तब राजनीतिक दलों ने इन चुनावों का बहिष्कार किया था। उसके बाद डीडीसी चुनाव के नतीजे सबके सामने हैं। लोगों को भरोसा न डगमगाए, इसके लिए सरकार को जल्द ही कुछ करना होगा। अगर एक बार भरोसा डगमगा गया तो हो सकता है कि दोबारा से पहले वाला वो सब देखने को मिले, जो अब कुछ शांत दिखाई पड़ रहा है। 

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