फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

थारू महिलाओं की जिंदगी बदल दी आरती ने

Mon, 07 Mar 2016 04:04 AM IST
विकास शुक्ला/अमर उजाला, लखीमपुर खीरी

सार

  • अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार से किया जाएगा सम्मानित।
  • तीन महिलाओं के साथ शुरू किया था काम, अब 1200 से अधिक महिलाएं उनके साथ काम कर रही हैं।
विज्ञापन
आरती राना - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

आरती राना महज आठवीं पास हैं। दुधवा के जंगल किनारे बसे आम थारुओं की तरह दो वक्त की रोटी के लिए जूझते हुए आरती ने थोड़ा सा हुनर सीखा। और सीखने की ललक हुई तो प्रशिक्षण लिया। देखते-देखते एक कारीगर महिला उद्यमी में बदल गई और उसने 12 सौ थारू महिलाओं को अपने साथ जोड़ कर उनकी भी जिंदगी बदल दी। आज यहां का पूरा थारू समाज इस महिला को नाम से जानता है।
विज्ञापन


थारू बस्ती की शायद ही कोई जरूरतमंद महिला ऐसी हो, जिसे आरती राना ने राह न दिखाई हो। यहां के बैग, टोपियां, मोबाइल कवर, दरी, डिजायनर साड़ियां और डलिया आदि उत्पाद दिल्ली और दूसरे प्रदेशों के बाजार में बिक रहे हैं। आज अनीता हर महीने तीन से साढ़े तीन लाख का कारोबार कर रही हैं लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। वह थारू महिलाओं की रोल मॉडल हैं।

लखीमपुर खीरी की डीएम किंजल सिंह की नजर इस महिला पर पड़ी तो उन्होंने न सिर्फ उनकी मदद की बल्कि थारू लोगों के विकास के और भी कई काम किए। कभी शिक्षा से दूर थारू लड़कियां आज कंप्यूटर पर काम कर रही हैं। आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर प्रदेश सरकार अनीता राना को रानी लक्ष्मीबाई वीरता पुरस्कार से सम्मानित करने जा रही है।
विज्ञापन


आरती राना ने हस्तशिल्प के क्षेत्र में कई नए प्रयोग किए। थारू बहुल गांव गोबरौला की आरती राना महज कक्षा आठ तक ही पढ़ी हैं। बचपन अभावों में बीता। कई बार घर में कुछ भी खाने को नहीं होता था। वर्ष 1994 में हथकरघा विभाग से मिले छह माह के प्रशिक्षण ने उनकी जिंदगी बदल दी। उन्होंने लगन से दरी और कालीन बुनने का काम सीखा। इसी दौरान सीतापुर के खैराबाद में उन्हें दरी उद्योग को देखने का मौका मिला।

तीन महिलाओं के साथ शुरू किया था काम

rupees note
वहां से लौट कर उन्होंने ठान ली कि मुझे भी कुछ करना है। प्रारंभ में तीन महिलाओं के साथ दरी और डलिया आदि बनाने का काम शुरू किया। 1994 में ही उनकी शादी पड़ोस के गांव गोबरैला के श्रीकृष्ण कुमार से हो गई। ससुराल में भी उन्होंने अपना काम जारी रखा। धीरे-धीरे दस महिलाओं को अपने साथ जोड़ा तो काम और बढ़ गया।

आर्थिक स्थिति ठीक न हो पाने के कारण वे अपने काम को आगे नहीं बढ़ा पा रही थी। 2008 में विश्व प्राकृतिक निधि (वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड फॉर नेचर) से उनको 40 हजार रुपये का अनुदान मिला। 2015 में उनको एक बड़ा पक्का हाल काम करने के लिए बनवा कर दिया गया। यहां हैंडलूम लग गए हैं।

आरती ने गौतम महिला स्वयं सहायता समूह बनाकर गांव-गांव जाकर थारू महिलाओं को घर के सारे कामों से निवृत्त होने के बाद खाली समय में हस्तशिल्प का काम करके अपनी आय बढ़ाने की प्रेरणा दी।

नाबार्ड ने उनका काम देखा और उनके साथ ही 25 महिलाओं को स्व रोजगार क्रेडिट कार्ड दिए, जिससे वे अपने काम के लिए दस हजार से एक लाख रुपये तक का लोन कभी भी ले सकती थीं। उसके बाद उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ने भी सहयोग दिया गया। आरती राना बताती हैं कि अब 1200 से अधिक महिलाएं उनके साथ काम कर रही हैं।
विज्ञापन

बेटे दिल्ली और बनारस में पढ़ते हैं

वाराणसी - फोटो : अमर उजाला
आरती राना ने बताया कि हमने शुरुआत में एक छोटी झोपड़ी में काम शुरू किया था। आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि हम अपने बच्चों को कॉपी-पेन भी नहीं दिल पाते थे। वह बताती हैं कि उनका बड़ा बेटा गौतम राना दिल्ली के एक स्कूल में दसवीं का छात्र है और छोटा बेटा गौरव राना बनारस के एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल में नवीं कक्षा में है। 

डीएम किंजल सिंह ने दिया सहारा

आरती राना कहती हैं कि आर्थिक तंगी के कारण उनके उत्पाद बाहर नहीं जा पा रहे थे, जिससे मजदूरी देने में भी दिक्कत होने लगी थी। डीएम किंजल सिंह ने तारा ग्राम ओरछा मध्य प्रदेश का भ्रमण कराकर उन्हें महिला स्वावलंबन के गुर बताए।

उनके सहयोग से गोवा के लोकोत्सव और लखनऊ महोत्सव में अपने हस्त निर्मित उत्पादों को बेचने का मंच मिला। अब उनके उत्पादों की बिक्री बढ़ी है, जिससे उनकी और सभी महिलाओं की आमदनी भी बढ़ गई है। वह बताती है कि ज्यादा माल की खपत से सभी महिलाएं खुश हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें