डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों से किसान सबसे ज्यादा परेशान है, क्योंकि खेती में सिंचाई के लिए पंपिंग सेट चलाने से लेकर खेतों की जुताई (ट्रैक्टर से) तक में डीजल की खपत होती है। सिर्फ एक एकड़ धान के खेत में सिंचाई के लिए 70 से सौ लीटर डीजल की खपत होती है।
यही कारण है कि डीजल की बढ़ती कीमतें घाटे की खेती को और ज्यादा घाटे में तब्दील करती जा रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि डीजल की बढ़ती कीमतों से प्रति एकड़ खेती की कीमतों में एक हजार रुपये से अधिक की लागत बढ़ चुकी है, जिससे किसानों की मुश्किल और बढ़ जाएगी। लेकिन एक संस्था का दावा है कि अगर किसान सिंचाई के लिए सोलर पंपों का इस्तेमाल करना शुरु कर दें तो इससे उनके घाटे की खेती फायदे में बदल जाएगी।
दरअसल, सोलर पंप सूरज की गर्मी को सोलर पैनल के जरिए इनवर्टर को चार्ज कर देते हैं, जिनसे सोलर पंपों को चलाया जा सकता है। एक बार के निवेश के बाद लगभग पांच साल तक इसमें कोई लागत नहीं आती। इससे न तो डीजल का खर्च होता है, और न ही वायु प्रदूषण होता है जो आज सबसे बड़ा चिंता का कारण बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन फायदों के बावजूद भारत का किसान पारंपरिक सोच रखने के कारण नवीन तकनीकी को अपनाने में पीछे रहता है।
31 दिसंबर 2017 तक के आंकड़ों के मुताबिक भारत के किसान अभी कुल सिंचाई पंपों का महज एक फीसदी ही सोलर पंप का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि सरकार अगले पांच वर्षों के बीच 6 फीसदी करने के लक्ष्य के साथ आगे चल रही है।
2022 तक लगाए जाएंगे 27,50,000 सिंचाई पंप
केंद्र सरकार की कुसुम योजना के तहत साल 2022 तक कुल 27,50,000 सिंचाई पंप स्थापित किए जाएंगे। इसमें 17,50,000 पंप ऑफ ग्रिड तकनीकी से लगाए जाएंगे। जानकारी के मुताबिक भारत में अभी तक (31 दिसंबर 2017) सिर्फ एक लाख चालीस हजार सोलर सिंचाई पंप लगाए जा सके हैं। जबकि इसी दौरान 1.90 करोड़ सिंचाई पंप बिजली से और नौ लाख सिंचाई पंप डीजल इंजनों से चलाए जाते हैं।
अगर इन्हीं आंकड़ों को प्रतिशत के रुप में देखें तो, सबसे ज्यादा 67 प्रतिशत बिजली से, 32 प्रतिशत डीजल से और महज एक फीसदी सिंचाई पंप सोलर से चलाए जा रहे हैं। इनमें सबसे ज्यादा सिंचाई सोलर पंप भारत के तीन राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश में लगाए गए हैं। पंजाब, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश जैसे राज्य, जहां भारी मात्रा में खेती होती है, वहां के किसान इस तकनीकी को अपनाने में बहुत पीछे हैं।
40 हजार सोलर सिंचाई पंपों के साथ राजस्थान इस श्रेणी में सबसे ज्यादा आगे है। लगभग 25 हजार पंपों के साथ छत्तीसगढ़ दूसरे नंबर पर, लगभग 18 हजार पंपों के साथ आंध्रप्रदेश तीसरे और लगभग 10 हजार सिंचाई पंपों के साथ उत्तरप्रदेश चौथे स्थान पर है।
दिल्ली में अभी तक एक भी किसान ने सोलर पंप का इस्तेमाल शुरु नहीं किया है। अगर बाकी राज्यों के किसान भी सोलर तकनीकी से चलने वाले सिंचाई मशीनों का उपयोग करें तो इससे उनकी माली हालत में बड़ा सुधार हो सकता है।
लागत में सरकारें दे रहीं भारी छूट
संस्था यूएसएआईडी के द्वारा मिली जानकारी के मुताबिक पारंपरिक सिंचाई मशीनों की लागत बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है। उनकी तुलना में सिर्फ एक हार्स पॉवर का सोलर सिंचाई और अन्य कारणों पर निर्भर तक की लागत आती है। इसमें एक किसान के लिए सबसे अच्छी बात यह है कि ज्यादातर सरकारें सोलर पंप लगाने पर भारी छूट भी दे रही हैं।
हरियाणा सरकार 60 प्रतिशत तो बिहार सरकार सौ फीसदी छूट (कुछ शर्तों के साथ) दे रही है। इससे अगर धान की लागत कीमत में प्रति एकड़ सौ लीटर डीजल की खपत को आधार मानें तो किसान को प्रति एकड़ आज की तारीख में सात हजार रुपये से अधिक की बचत हो सकती है।