सांसद देश की सबसे बड़ी पंचायत में आपका प्रतिनिधि होता है। उसका काम जनता से जुड़े मुद्दे उठाना है, लेकिन सदन में सांसद आपके हित या अहित को दरकिनार कर पार्टी की हां में हां मिलाते हैं। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक पिछले सात साल में एक भी सांसद ने अपनी पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर कोई वोट नहीं किया। 2009-2016 तक लोकसभा और राज्यसभा में पार्टियों ने व्हिप जारी कर अपने सांसदों को अपने पक्ष में वोट करने के लिए मजबूर किया। कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव के प्रोग्राम कोऑर्डिनेटनर वेंकटेश नायक ने यह आरटीआई लगाई थी।
नायक बताते हैं कि सांसदों को संविधान की धारा 105 (2) के तहत पार्लियामेंट में फ्रीडम ऑफ एक्शन का अधिकार दिया गया है। इसके तहत वह अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों के हित-अहित को ध्यान में रखकर अपने मत का प्रयोग कर सकते हैं। लेकिन सांसद अपने इस अधिकार का प्रयोग नहीं करते, क्योंकि दलबदल विरोधी कानून, 1985 की आड़ में पार्टियां अपने सांसदों के लिए व्हिप जारी कर देती हैं। हैरत की बात है कि किसी पार्टी द्वारा व्हिप जारी करने की जानकारी लोकसभा या राज्यसभा सचिवालय को नहीं दी जाती है।
अगर कोई आरटीआई लगाकर राष्ट्रीय दलों से व्हिप के बारे में पूछता है तो वह यह कह कर मना कर देती हैं कि वे आरटीआई दायरे में नहीं आते। जबकि केंद्रीय सूचना आयोग के एक आदेश के तहत राष्ट्रीय दल भी आरटीआई के दायरे में हैं। गौरतलब है कि 1967 में दलबदल पर रोक लगाने के लिए एक कमेटी गठित की गई थी, जिसमें ये भी सुनिश्चित किया गया था कि सदस्यों का पार्टी से असहमति का अधिकार बना रहे जो लोकतंत्र की मूल भावना के लिए जरूरी है। 1985 में राजीव गांधी की सरकार ने यह कानून लागू किया, लेकिन कमेटी के सुझाव को वरीयता नहीं दी गई।
इस मामले पर संसदीय मामलों के जानकार और पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च चक्षुराय का कहना है कि व्हिप जारी करने से सांसद रबड़ स्टांप की तरह हो जाता है। व्हिप जारी करने के बाद सांसदों को संसद में बुलाकर बहस ही क्यों की जाती है। क्योंकि सभी को पता है कि किसी के पक्ष में कितने वोट हैं। किसी सांसद का अपनी पार्टी के प्रति असहमति व्यक्त न कर पाना उसके संसदीय क्षेत्र के लोगों की जुबान पर ताला लगाने जैसा है। संविधान में संसद सदस्य का उल्लेख तो है, लेकिन राजनीतिक दल जैसी कोई चीज नहीं है।