वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 23 जुलाई, 2024 को भारत के अनुसंधान इकोसिस्टम के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण की घोषणा की, अनुसंधान राष्ट्रीय शोध फाउंडेशन (एएनआरएफ) का संचालन। यह एक ऐसा कदम था, जिसे तैयार करने में इसके पहले उल्लेख के बाद से पांच साल लग गए। एएनआरएफ अधिनियम, 2023 के तहत स्थापित, इस फाउंडेशन का उद्देश्य भारत के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अनुसंधान को वित्तपोषित करना, समन्वय करना और बढ़ावा देना है, जो लंबे समय से खासकर राज्य की ओर से संचालित संस्थानों में अवसंरचना की कमी का सामना कर रहे हैं। यह पहल भारत को अमेरिका, जर्मनी, दक्षिण कोरिया और इस्राइल जैसे अनुसंधान महाशक्ति के मॉडल के अनुसरण में ज्ञान-आधारित समाज बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
एएनआरएफ का प्राथमिक लक्ष्य राज्य और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अवसंरचना की कमी को दूर करना है, जहां 95 फीसदी छात्र नामांकित हैं, लेकिन शोध क्षमताओं का अभाव है। फाउंडेशन का उद्देश्य समय पर धन का वितरण करना, नौकरशाही से जुड़ी बाधाओं को कम करना और उद्योग-अकादमिक सहयोग को बढ़ावा देना है। पांच वर्षों में 50,000 करोड़ रुपये का कुल बजट निर्धारित किया गया है, जिसमें सरकार का योगदान 14,000 करोड़ रुपये है। शेष राशि को उद्योग और परोपकारी व्यक्तियों जैसे गैर-सरकारी स्रोतों से जुटाया जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण अमेरिका के सफल मॉडल के अनुरूप है, जहां अनुसंधान और विकास का ज्यादातर वित्तपोषण निजी क्षेत्र से आता है। यूएस नेशनल साइंस फाउंडेशन (एनएसएफ) से प्रेरित होकर एएनआरएफ का लक्ष्य एक ऐसा ही इकोसिस्टम बनाना है, जहां उच्च जोखिम वाले अत्याधुनिक अनुसंधान शैक्षणिक संस्थानों के अंतर्गत विकसित हो सकें। अमेरिका के विश्वविद्यालयों में बेहतरीन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यालय हैं, जो संकायों को कंपनियां स्थापित करने और उद्योगों के लिए परामर्श देने में मदद करते हैं। ये सभी कुछ ऐसी बातें हैं, जिन्हें एएनआरएफ भारत में दोहराने की इच्छा रखता है। एएनआरएफ को क्रियान्वित करने का निर्णय राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में उल्लिखित लक्ष्यों के साथ अच्छी तरह मेल खाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारत को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि भारत के विभिन्न 1,168 विश्वविद्यालयों एवं 45,473 कॉलेजों में 4.3 करोड़ से अधिक विद्यार्थी पढ़ते हैं, शिक्षण और अनुसंधान के बीच के अंतर को पाटना आवश्यक है।
एक लाख करोड़ रुपये के कोष की घोषणा
एएनआरएफ की ओर से निम्न प्रौद्योगिकी तत्परता स्तरों (टीआरएल) की सहायता करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना भी महत्वपूर्ण है। अनुसंधान के इस चरण के लिए शैक्षणिक संस्थान ज्यादा उपयुक्त हैं, जहां पूंजी की आवश्यकता कम होती है, विफलता की दर अधिक होती है और विद्यार्थी दीर्घकालिक परियोजनाओं में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। सरकार की ओर से हाल ही में की गई फोकस्ड रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (एफआरओ) और डीप-टेक स्टार्टअप में उच्च टीआरएल अनुसंधान के लिए 1 लाख करोड़ रुपये के कोष की घोषणा एएनआरएफ के प्रयासों को पूर्णता प्रदान करती है। साथ ही, इन दोनों पहलों का उद्देश्य बुनियादी से लेकर उद्योग-संचालित विकास तक के अनुसंधान के पूरे स्पेक्ट्रम को कवर करना है, जिससे एक व्यापक आरएंडडी इकोसिस्टम का निर्माण होगा।
सही दिशा में उठाया गया कदम
निस्संदेह एएनआरएफ सही दिशा में उठाया गया कदम है। यह कदम भारत की अनुसंधान क्षमताओं के लिए एक बड़ी छलांग है, जो भारत की उच्च शिक्षा और अनुसंधान प्रणाली की विशिष्ट चुनौतियों से निपटते हुए सर्वोत्तम वैश्विक कार्यप्रणालियों से प्रेरणा लेता है। सही कार्यान्वयन के साथ, एएनआरएफ में सतत और समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त करते हुए भारत को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करने की क्षमता मौजूद है।