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शिखर का सफर: सरकारी नौकरी छोड़ ऑनलाइन गुरु बना गांव का लड़का, अब संवार रहा करोड़ों छात्रों का भविष्य

Mon, 28 Oct 2024 05:25 AM IST
दीपक कुमार शर्मा मनीष मिश्र, अमर उजाला

सार

गांव का लड़का अंकित भाटी डिजिटल एजुकेशन का महारथी कैसे बना और क्या है उनके संघर्षों की कहानी...इस पर पेश है मनीष मिश्र से विशेष बातचीत...
 
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अंकित भाटी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कोचिंग सेंटर में 31 बच्चों से लेकर करोड़ों बच्चों की हाईटेक ऑनलाइन क्लास चलाने का सफर आसान नहीं था। इसके लिए कड़ी मेहनत के साथ बड़े फैसले लेने पड़े। यह सफर है अंकित भाटी का, जो 'रोजगार विद अंकित' नाम से यूट्यूब चैनल चलाते हैं।

  • उनके चैनल पर 1.35 करोड़ सब्सक्राइबर हैं...75 शिक्षकों के स्टाफ के साथ रोज 205 वीडियो क्लासेज करते हैं। यहां तक पहुंचने के लिए उन्हें सरकारी नौकरी तक छोड़नी पड़ी।
  • सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे ग्रामीण युवाओं के लिए अंकित भाटी एक रास्ता हैं।

पढ़ाने की शुरुआत कब हुई?

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पिताजी टीचर हैं, तो पढ़ाने की प्रेरणा वहीं से मिली। पिताजी गांव के बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पढ़ाया करते थे। 2009 में, उन्होंने मुझसे क्लास लेने को कहा। पहले दिन जब मैं पढ़ाने गया, तो मेरी उम्र 18 साल थी। जिन बच्चों को पढ़ाना था, वे बड़े थे। मुझे याद है कि मैंने ब्लैकबोर्ड की ओर मुंह किया और पढ़ाता चला गया। जब क्लास से बाहर निकला, तो सभी ने तालियां बजाई। फिर, थोड़ा आत्मविश्वास आया। थोड़े समय बाद बच्चों ने ही कह दिया कि वे हम से ही पढ़ना चाहते हैं। 2009 से 2018 तक जिन सात-आठ हजार बच्चों को पढ़ाया, उनमें से करीब 1,700 को नौकरी मिल गई।

क्या आप शुरू से ही शिक्षक बनना चाहते थे?
मुझे नहीं लगता, गांव का कोई बच्चा पहले से सोच पाए कि वह क्या बनेगा? मैं अपने कार्य से संतुष्ट हूं। इससे बेहतर कोई काम नहीं हो सकता। आज लाखों युवाओं की जिंदगी बेहतर बना पा रहा हूं। जो भी हूं, इन्हीं बच्चों की बदौलत हूं।
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ऑनलाइन क्लास की शुरुआत कैसे हुई?
नौकरी के कारण समय की कमी थी, तो रिकॉर्डेड वीडियो का विचार आया। लेक्चर रिकॉर्ड करते तो वीडियो भारी हो जाता। फिर पता चला कि बिना चेहरा दिखाए भी लोग पढ़ाते हैं। यूट्यूब पर सर्च किया और पेनटैब ऑनलाइन मंगवाया। हमने पहला वीडियो यूट्यूब पर 7 जनवरी, 2018 को अपलोड किया।

  • एक दिन एक बच्चे ने बताया कि आपके वीडियो से बुलंदशहर के बच्चे भी पढ़ते हैं...मुझे भी आश्चर्य हुआ। पहली वीडियो को एक महीने में 1,000 व्यूज मिले, तो खुशी हुई। इसके बाद रोजाना रात आठ बजे ऑफिस से घर आता और 11 बजे तक वीडियो बना कर यूट्यूब पर अपलोड करने का सिलसिला चल पड़ा।
  • एक दिन पापा ने पूछा...इससे कुछ फायदा है? मैंने कहा, अभी तो पता नहीं, लेकिन बच्चे पढ़ रहे हैं। मैंने पापा से कहा, गणित की एक बुक है, उसे पूरी करने के बाद छोड़ दूंगा। किताब चार-पांच महीने में पूरी हो गई, लेकिन तब तक चैनल पर ग्रोथ आ चुकी थी।

नौकरी के साथ कोचिंग में पढ़ाना कितना मुश्किल था?
2011 में पहली नौकरी चंडीगढ़ में लगी। इसे ज्वाइन नहीं किया क्योंकि वहां पढ़ाना रुक जाता। 2012 में दिल्ली में विदेश मंत्रालय में नौकरी लगी, तो बच्चों को पढ़ाना जारी रखा। रोज सुबह छह से आठ बजे तक पढ़ाने के बाद ऑफिस के लिए निकलना होता था।

सरकारी नौकरी छोड़ने का फैसला कितना कठिन था?
सोचा नहीं था कि नौकरी छोड़नी पड़ेगी। कोई भी निर्णय लेने से पहले पापा से जरूर बात करता हूं। पत्नी को बताता हूं। माता जी हमेशा साथ होती हैं। पत्नी सरकारी टीचर हैं, तो विश्वास था कि अगर एक का काम फेल भी हुआ, तो गुजारा हो जाएगा। दो महीने की छुट्टी लेकर पूरी तरह से पढ़ाया और इसके बाद नौकरी छोड़ दी।  

  • घरवालों को समझ आने लगा कि क्या कर रहा हूं। पिताजी भी बताते हैं कि बाकी लोग क्या कर रहे हैं और हमें क्या करना चाहिए। बहन भी क्लास लेती थी।

टीम के तौर पर कब से काम शुरू किया?
15 अगस्त, 2020 को टीम के तौर पर काम शुरू किया। हमारे पास 20 लाख रुपये थे। 'आजाद' नाम से एक बैच लेकर आए। इसमें हर बच्चे को 500 रुपये देने थे। सोचा बैच नहीं बिका, तो पास से सैलरी दे देंगे और बैच बंद कर देंगे। इसे 25,000 बच्चों ने खरीदा। इस तरह 1.25 करोड़ आ गए। अगला बैच फ्री दिया। आज हमारे क्लासेज पूरी तरह ऑनलाइन हैं। 80 फीसदी बच्चे गांव के हैं, इसलिए कोर्स 500-1,000 रुपये के बीच ही रखते हैं। टीम में 75 टीचर सहित 300 लोग हैं। यूट्यूब चैनल पर 1.35 करोड़ सब्सक्राइबर्स हैं। रोजाना 205 लेक्चर रिकॉर्ड करते हैं। 17 स्टूडियो ऑफिस में हैं और 13 अध्यापकों के घर पर हैं।

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