सूखा प्राकृतिक है या लोगों द्वारा पैदा किया गया?
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जरूरत पड़ी तो हम छीन कर खा लेंगे। चार छह किलोमीटर जाकर पानी पी लेंगें। इससे भी काम नहीं चला तो गांव छोड़कर शहर चले जाएंगे लेकिन इन बेजुबानों का क्या करें। एक के बाद एक मर रहे हैं। खूंटे पर मरने से पाप अलग से लग रहा है। यह दर्द है बांदा जिले के अंतिम छोर पर बसे गांव महराजपुर के बशीर का। बशीर की तरह ही बुंदेलखंड के हर जिले में सूखे से कराह रहे लोगों के सामने पशुओं को बचाना चुनौती बन गई है। हमने बुंदेलखंड के जिलों के अलग-अलग गांवों में जाकर भूसा वितरण और जानवरों की स्थिति की पड़ताल की तो हालात चौंकाने वाले मिले।
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर बसे महराजपुर गांव में ज्यादातर पटेल बिरादरी के लोग हैं। मुख्य मार्ग से करीब 500 मीटर अंदर गांव तक पक्की सड़क बनी है। सड़क के दोनों तरफ कच्चे मकान हैं। किसी के दरवाजे पर एक भैंस बंधी है तो किसी के दो। गांव में प्रवेश करते हैं तो लोग घेर लेते हैं। राशन कार्ड के बारे में पूछते ही फट पड़ते हैं। कहते हैं कि राशन की मत पूछो। पहले जानवरों का हाल पूछो। बब्बन सिंह तपाक से कहते हैं कि सड़क के किनारे खेतों पर नजर डालो तो अपने आप समझ जाओगे। हर तरफ हड्डी पड़ी है। जो जानवरों के मरने का सबूत दे रही है।
बब्बन सिंह की तरह ही विकलांग बदलू भी बोलते हैं। कहते हैं कि भूसा देने की बात कही गई थी लेकिन एक तिनका भी नहीं मिला। चारे का इंतजाम नहीं कर पाया तो खुला छोड़ दिया। कुछ दिन तक गाय अन्ना जानवरों के साथ रही। दो दिन पहले पता चला कि वह खेत में मरी पड़ी है। खेत में गया। आंसू बहाया और फिर गड्ढा खोदवाकर दफन करा दिया। आखिर कर भी क्या सकते हैं। खुद के खाने का इंतजाम करें कि जानवरों का पेट भरे। एक भैंस दूध दे रही है। किसी तरह उसके चारे-पानी का इंतजाम कर रहे हैं। कुछ ऐसी ही बातें नरैनी तहसील के बिल्हरका, महाराजपुर, शाहबाजपुर आदि गांवों के पशुपालक बताते हैं।