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भारत का एक गाना गाने वाला गांव, जहां बात सीटी बजाकर होती है

Wed, 19 Sep 2018 01:17 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कांगथांग
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singing-village
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इशारों-इशारों में बात करने वाले तो खूब देखे-सुने गए हैं। लेकिन जब गीत संगीत और सीटी बजाकर बातचीत करने की हो तो भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मेघालय का एक गांव कांगथांग सामने आया है, जहां दोस्त दोस्त को बुलाता है एक खास धुन गुनगुनाकर, मां अपने बच्चे को बुलाती है एक धुन गुनगुनाकर। घने जंगलों वाले इस गांव में अक्सर अलग-अलग प्रकार की सीटियां और चहचहाहट की आवाजें सुनाई देती रहती हैं।

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अक्सर लोग इस चहचहाहट को पक्षियों की आवाज समझ लेते हैं लेकिन आप चौंक जाएंगे यह जानकर यह आवाजें किसी पक्षी की नहीं बल्कि इस गांव के लोगों की होती है जो एक दूसरे को बुला रहे होते हैं।

 वहां के लोग एक असाधारण अंदाज में बात करते हैं और यह बात चौंकाती है कि यह अलग अंदाज  इस गांव की परंपरा है। जिस तरह से इस गांव का नाम है कांगथांग वैसे ही यहां का अंदाज भी निराला है। एक-दूसरे को किसी खास धुन या आवाज से संबोधित करना ही इस गांव के लोगों की खासियत है। 
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जैसे मांए अपने बच्चों को लोरियां सुनाती हैं वैसे ही कांगथांग और आसपास के गांवों में मां अपने बच्चे के लिए एक खास संगीत और धुन बनाती हैं, जिसके बाद हर कोई उस बच्चे को पूरी जिंदगी उसी धुन से बुलाता है। 

खासी बाहुल्य जनजाति वाले इस गांव के लोगों के परंपरागत 'वास्तविक' नाम भी होते हैं, लेकिन इनका प्रयोग शायद ही कभी किया जाता है। जब मुख्यमार्ग से आप इस गांव में प्रवेश करेंगे तो आपको अधिकतर घर लकड़ी से बने दिखेंगे जिनकी छत टिन की हैं। 

meghalaya
मजेदार बात यह है कि मां जब अपने बच्चे को बुलाती है तो उसके बुलाने का अंदाज भी संगीत से भरा होता है। एक तरफ जहां पूरी दुनिया में मां के बच्चे को नाम से बुलाने पर भी बच्चे नहीं सुनते हैं ऐसे में संगीतमय धुन पर बच्चे किस तरह सुनते हैं यह बात चौंकाती है। तीन बच्चों की मां पेंडप्लिन शबांग कहती हैं, 'अपने बच्चे के लिए एक खास संगीत दिल की गहराइयों से निकलता है। यह आवाज अपने बच्चे के लिए मेरी खुशी और प्यार को व्यक्त करता है।'

 समुदाय के एक नेता रोथल खांगसित बताते हैं कि जब परिवार वाले किसी बात को लेकर अपने बच्चे से नाराज होते हैं तो वह  उसे  उसके वास्तविक नाम से बुलाते हैं ऐसे में बच्चे को बताना नहीं पड़ता है कि मां-बाप उससे नाराज हैं। 

 जब दुनिया में लड़ाई झगड़ा और करकशता बढ़ती जा रही है ऐसे में यह गांव काफी सुकून देने वाला है। गांव वालों का कहना है कि कांगथांग लंबे समय तक बाकी दुनिया से कटा रहा था। यहां से पास के शहर तक पहुंचने के लिए कई घंटों की कठिन यात्रा करनी पड़ती है। जब गांव को बारीकी से देखने की कोशिश करेंगे तो आपको पता चलेगा कि यहां आज तक मिठास बची है क्योंकि गांव शहरी चकाचौंध से काफी दूर है।

यही नहीं मूलभूत सुविधाएं भी यहां नहीं पहुंची हैं। इस गांव में बिजली भी 2000 में पहुंची, जबकि सड़क पक्की भी साल 2013 में ही बन पाई है। गांव के बच्चों को छोड़कर यहां के ज्यादातर लोगों का समय जंगल में 'बांस' की खोज में बीतता है, जो यहां के लोगों की कमाई का मुख्य स्रोत हैं। 

नाम है संगीत का  

गांव में रहने वाले खांगसित बताते हैं, 'जंगल में रहते हुए बात करने के लिए ग्रामीण एक-दूसरे के संगीत के 'नाम' से बुलाते हैं यही नहीं इसके लंबे संस्करण का उपयोग भी करते हैं।

संगीत वाला नाम 30 सेकेंड तक लंबा होता है और प्रकृति से प्रेरित होता। हम काफी विस्तृत और घने जंगल से घिरी हुई जगह में रहते हैं, जिसके चारों पहाड़ियां हैं, इसलिए हम प्रकृति जुड़े हुए हैं। हम ईश्वर के हुए अनमोल जीवों के बीच रहते हैं।' 
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लेकिन यह बात चौंकाती है कि लोगों को इस परंपरा के बारे में ज्यादा पता नहीं है लेकिन यहां के लोगों ने इस परंपरा को संजो कर रखा है। आधुनिकता ने टीवी और फोन की मदद से यहां अपनी जगह बना ली है। मजेदार बात है कि प्राकृतिक संगीत के बीच गांव में अब बॉलीवुड संगीत भी जगह बना रहा है।

 कुछ नए लोगों के नाम बॉलिवुड के गीतों से प्रेरित होकर रखे गए हैं। लेकिन यहां के युवा अपने दोस्तों फोन करने के बजाय आज भी उनको उनके सुंदर संगीतमय नाम से ही बुलाना पसंद करते हैं। 

टर्की और स्वीडन-नॉर्वे में भी हैं ऐसी ही परंपरा 

ऐसी ही परंपरा दुनिया के कुछ अन्य देशों में भी देखी गई है। टर्की के गिरेसुन प्रांत में बर्ड लैंग्वेज, यानी पक्षियों की भाषा में बात करते हैं। इस पहाड़ी इलाके में करीब 10 हजार लोग रहते हैं, जो एक-दूसरे से बर्ड लैंग्वेज में बात करते हैं।

यूनेस्को ने इस अनोखी भाषा को पिछले साल ही अपनी सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया था। वहीं, स्वीडन और नार्वे के कुछ हिस्सों में लोग पहाड़ों पर चर रहे अपने पालतू जानवारों को बुलाने के लिए भी एक खास तरह की आवाज निकालते हैं। इस आवाज को 'कुनिंग' के नाम से जाना जाता है। 
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