क्या थी कृष्ण गोपाल की बिप्लब परीक्षा
मार्च 2015 की शुरुआत में एक दिन सुबह बिप्लब जब अपने सामान्य रूटीन के तहत कृष्ण गोपाल से मिलने दिल्ली के झंडेवालान स्थित
संघ कार्यालय पहुंचे तो कृष्ण गोपाल ने उन्हें बड़े निर्णय का ऑफर कर दिया। एक तरह से कृष्ण गोपाल ने बिप्लब के सामने यह ऑफर देकर उसे तौलना चाहा की उसमें पूर्वोत्तर को लेकर अब भी प्रेम बचा है कि नहीं। दरअसल कृष्ण गोपाल ने जो ऑफर छोड़ा था वह बड़ा ही खतरनाक था। कृष्ण गोपाल ने बिप्लब को त्रिपुरा जाकर भाजपा की राजनीति करने का ऑफर उस वक्त दिया जब पार्टी का वहां आधार ही नहीं था। लोकसभा चुनाव 2014 में भी यहां भाजपा के खाते में महज 1.3 प्रतिशत वोट मिले थे। ऐसे में दिल्ली की चमक दमक छोड़ पत्थर पर घास उगाने सरीखे कार्य के लिए शायद ही कोई तैयार होता।
मगर बिप्लब ने कृष्ण गोपाल के निर्देश को स्वीकारते हुए त्रिपुरा लौटकर राजनीति का निर्णय लिया। कृष्ण गोपाल ने उनके सामने यह शर्त रखा था कि वह अभी निर्णय लें कि वह दिल्ली में अपनी जमी-जमाई गृहस्थी में रहना चाहते हैं अथवा त्रिपुरा की कमान संभालना चाहते हैं। दिल्ली के ठाठ-बाट और सिस्टम से जाने का फैसला लेना तब बिप्लब के लिए भी मुश्किल था। क्योंकि यहां पत्नी की सरकारी नौकरी और बच्चों की पढ़ाई के अलावा बिप्लब की खुद की सत्ता के गलियारों से लेकर भाजपा संगठन में मजबूत पकड़ थी। लेकिन अपना फैसला सुनाने से पहले बिप्लब ने एक दिन का समय कृष्ण गोपाल से मांगा। मगर कृष्ण गोपाल थे कि उन्होंने तत्काल फैसले लेने को कहा।
हालांकि बिप्लब के प्रति स्नेह के कारण उन्होंने उसे एक दिन का समय दिया साथ में यह शर्त जोड़ा कि वह इस बात को किसी से साझा नहीं करे। अगले दिन बिप्लब ने कृष्णगोपाल से मिलकर जब उन्हें अपना फैसला बताया तो संघ सह सरकार्यवाह बेहद प्रसन्न हुए। मानो जैसे की उन्हें कोई नगीना मिल गया हो। बिप्लब को उन्होंने तुरंत प्रभाव से त्रिपुरा जाकर भाजपा की राजनीति में सक्रियता बनाने को कहा। उनके निर्देशों का पालन करते हुए बिप्लब मई में त्रिपुरा चले गए। और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बाद में उन्हें संपर्क अभियान का प्रभारी बनाया। उसके बाद वर्ष 2016 में वे राज्य भाजपा के अध्यक्ष बने।
हालांकि प्रदेश के कुछ नेता एवं कार्यकर्ताओं की ओर से उनका विरोध भी हुआ। लेकिन अपने मृद भाषी रवैये से बिप्लब को सबको साथ लिया और सूबे में भाजपा की एक ऐसी फौज तैयार की जोकि वाम से उसकी शैली में ही लोहा ले सके। हालांकि बाद में उनके मित्र स्वरूप नेता सुनिल देवधर सूबे के प्रभारी बने। बिप्लब और देवधर की जोड़ी ने जमकर पसीना बहाया और सूबे में संगठन को मजबूत बनाया। चुनावी रणनीति को अंजाम देने के लिए बाद में भाजपा ने लक्की महासचिव राम माधव को प्रदेश की रणनीति से जोड़ दिया।
रिवर्स माइग्रेसन के उदाहरण भी हैं बिप्लब
बिप्लब देव रिवर्स माइग्रेसन के उदाहरण भी हैं। आम लोगों की तरह अपना जीवन चलाने के लिए बिप्लब ने भी देश की राजधानी दिल्ली की ओर रुख किया। वे बालकाल से संघ के स्वयंसेवक रहे हैं। संघ की उन्होंने प्रथम वर्ष की शिक्षा हासिल की है। दिल्ली आने में भी संघ ही वजह बना। दिल्ली आने की इच्छा उन्होंने नागपुर के एक संघ प्रचारक के समक्ष रखी थी। उक्त प्रचारक ही बिप्लब को दिल्ली लेकर आए। और अगरतला से बीए की शिक्षा हासिल कर वर्ष 1989 में बिप्लब दिल्ली पहुंचे। शुरुआती दिनों में उन्होंने संघ कार्यालय झंडेवालान में कार्य किया। इसी दौरान उनकी भेंट भाजपा महासचिव एवं संघ प्रचारक केएन गोविंदाचार्य से हुई।
कुछ वर्षों के बाद बिप्लब संघ कार्यालय छोड़ गोविंदाचार्य के संग कार्य करने लगे। अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में राजग की सरकार बनने के बाद गोविंदाचार्य के सहयोग से बिप्लब को केंद्रीय मंत्री रीता वर्मा के साथ बतौर निजी सहयोगी के रूप में कार्य करने का मौका मिला। जब रीता वर्मा की सांसदी 2009 में चली गई तो बिप्लब ने मध्यप्रदेश की सतना से सांसद गणेश सिंह के साथ बतौर सहयोगी के रूप में कार्य प्रारंभ कर दिया। इस बीच बिप्लब की शादी भी दिल्ली में ही हुई। करोल बाग के एक पंजाबी परिवार की लड़की से उन्हें प्यार हुआ और वह प्यार शादी के बंधन में बंध गई। बिप्लब की पत्नी नीति एसबीआई के संसद मार्ग ब्रांच में कार्यरत्त है। वे हमेशा से बिप्लब की मददगार रही है।
त्रिपुरा से हमेशा रहा है बिप्लब को प्यार
बिप्लब को अपने जन्मभूमि से प्यार हमेशा ही रहा है। जब वे दिल्ली में अपनी गृहस्थी और राजनीति चला रहे थे तो प्रदेश के विकास को लेकर हमेशा तत्पर रहे। कई दफे सूबे की कुछ योजनाओं को लेकर वे केंद्र सरकार के अधिकारियों से मिलकर उनका समाधान निकलवाते रहे। राज्य में सरकार बेशक वाम की थी लेकिन अपने व्यक्तिगत प्रयास के जरिए बिप्लब सूबे की विकास योजनाओं के लिए प्रयारत रहे। अपने संघर्ष के दिनों में बिप्लब ने अपना जीवन नार्थ एवेन्यू (सांसदों के रहने का फ्लैट) के बरसाती से लेकर सांसद आवास में बिताया है। इसके अलावा सामाजिक संगठनों से भी उसका जुड़ाव रहा है।
संघ के लोगों से है करीबी नाता
बिप्लब का संघ के अधिकारियों से करीबी नाता रहा है। कृष्ण गोपाल के अलावा पूर्वोत्तर के संगठन महामंत्री रहे रमेश सिलेदार, केएन गोविंदाचार्य, पूर्वोत्तर के संघ प्रचारक उल्लास राव कुलकर्णी समेत तमाम संघ प्रचारकों एवं भाजपा नेताओं से बिपल्ब का मेलजोल रहा है। पूर्वोत्तर में संघ के जरिए चलाई जा रही प्रकल्पों को भी वे दिल्ली से मदद करते थे। बिप्लब के पिता हीरूधन देब त्रिपुरा में जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में एक रहे हैं। उन्होंने जनसंघ के टिकट पर तीन बार चुनाव लड़ा मगर सफलता हाथ नहीं लगी। लेकिन बिप्लब का यह पहला चुनाव है और पहली बार में ही वाम सरीखे दल को धूल चटाने के बाद बिप्लब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचने जा रहे हैं।