पार्टी सूत्रों के मुताबिक जमीनी स्तर की बात करें तो कर्नाटक चुनावों से ठीक पांच महीने पहले ही उन्होंने अपनी रणनीति बना ली थी। पांच महीनों में उन्होंने 34 दिन कर्नाटक में बिताए। इस दौरान उन्होंने 28 जिलों का दौरा किया और तकरबीन 57 हजार किलोमीटर की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने 59 रैलियां, 25 रोड शो और 38 से ज्यादा जनसभाएं की। उन्होंने 33 मंदिर और मठों का दौरा किया और "शक्ति केन्द्र" स्तर की 18 संगठनात्मक बैठकों में हिस्सा लिया।
उनके साथ काम कर चुके पार्टी के एक नेता के मुताबिक "शक्ति केन्द्र" का कॉन्सेप्ट अमित शाह की ही देन है, जो बूथ कमेटियों का एकत्रिकरण है। 'बी फॉर बूथ' अमित शाह के लिए केवल शब्द मात्र नहीं हैं, बल्कि इसमें चुनाव जीतने की पूरी रणनीति समाई हुई है। हाल ही में 14 मई को राष्ट्रीय पदाधकारियों, समस्त प्रदेश अध्यक्षों और संगठन महामंत्रियों की बैठक में उन्होंने बूथ मैनेजमेंट पर पूरा जोर दिया।
सूत्रों के मुताबिक हालिया कर्नाटक चुनावों का उदाहरण देते हुए वह बताते हैं कि राज्य में उन्होंने एक विस्तारक कार्यक्रम लॉन्च किया, जिसमें प्रत्येक नेता को अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में रात गुजारनी थी। प्रत्येक एमएलए को एक अन्य निर्वाचन क्षेत्र का प्रभार दिया गया, जहां से कोई बीजेपी विधायक निर्वाचित नहीं था। इसके अलावा प्रत्येक सांसद को 2 निर्वाचन क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गई। बूथ मैनेजमेंट को मजबूती देने के लिए प्रमुख मतदाताओं, सेवादारों और धार्मिक नेताओं, सहकारी संघ के नेताओं, वकालत करने वालों और सेल्फ हेल्प ग्रुप के सदस्यों से संपर्क करने की जिम्मेदारी दी गई।
9 कार्यकर्ताओं को प्रत्येक बूथ की जिम्मेदारी दी गई, जिसमें जाति का खास ख्याल रखा गया। इसमें 2 महिलाएं, दो एससी-एसटी, दो ओबीसी सदस्यों को इसमें शामिल किया गया। इस प्रकार प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में 200 से ज्यादा बूथ बनाए गए, यहां तक कि कई जगहों पर 500 से ज्यादा बूथ भी बनाए गए। साथ ही यह सुनिश्चित किया गया कि प्रत्येक 5 बूथों पर बने शक्ति केन्द्र से जुड़े नेताओं को बूथ कमेटी पूरी रिपोर्टिंग करें।
सूत्रों के मुताबिक उनका दूसरा प्लान "बी" बूथ मैनेजमेंट की रिपोर्ट को हकीकत में उतारने का होता यानी इसे दूसरा चरण भी कह सकते हैं। सूत्र उनकी रणनीति का खुलासा करते हुए बताते हैं कि बूथ कमेटी से पता चलता है कि मतदाता क्या चाहता है। इसका इस्तेमाल घोषणापत्र बनाने में किया जाता है। इसके लिए तकरीबन सभी इलाकों में घोषणापत्र सम्मेलन आयोजित किया जाता है, जिसमें उन लोगों को आमंत्रित किया जाता है जो बीजेपी से ताल्लुक नहीं रखते हैं। इसमें उनके विचार मांगे जाते हैं जिसका इस्तेमाल राज्य स्तर के घोषणापत्र को बनाने में किया जाता है।
इसी प्लान में पार्टी ओबीसी, एससी-एसटी और किसान सम्मेलन जैसे आयोजन करती है। साथ ही कार्यकर्ताओं को नमो एप से संबोधन की रणनीति बनाई जाती है। लिंगायत मुद्दे का जिक्र करते हुए सूत्रों का कहना है कि जब सिद्धारमैया सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म घोषित करने की चुनावी दांव खेला तो शाह ने प्लान "बी" के तहत उनके मठों में पहुंचने की रणनीति तैयार की। साथ ही व्हाट्सअप ग्रुप्स और सोशल मीडिया को उन्होंने हथियार की तरह इस्तेमाल किया और वोटरों तक अपनी पहुंच बनाई। सूत्र बताते हैं कि प्लान "बी" में संघ परिवार का अहम किरदार होता है। आरएसएस, वीएचपी और बजरंग दल को डोर-टू-डोर कैंपेन में लगाया जाता है।