मध्यप्रदेश में पार्टी के अपने ही वरिष्ठ नेता भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सपने को पलीता लगा रहे हैं। वर्ष 2018 के अंत में होने वाले मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए शाह ने सूबे में विधानसभा की 200 सीटों पर पार्टी के जीत का लक्ष्य तय किया है।
मगर पार्टी के अपने ही बुजुर्ग नेता सूबे में भाजपा का माहौल बनने नहीं दे रहे हैं। किसान आंदोलन के दंश से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बमुश्किल ही उबर पाए हैं कि वरिष्ठों ने उनकी राह में रोड़े अटकाने शुरू कर दिए हैं।
दरअसल सूबे में करीब आधा दर्जन नेताओं की संख्या ऐसी है जोकि अगले विधानसभा चुनाव में रिटायर्ड कर दिए जाएंगे। यही वजह है कि वे नेता चुनाव से पहले शिवराज और भाजपा की मुश्किलें बढ़ाकर अपने भविष्य के लिए कुछ मोल-भाव कर लेना चाहते हैं। लेकिन सूत्र बताते हैं कि भाजपा आलाकमान अभी इन नेताओं को भाव देने के मूड में नहीं है।
कौन अड़ा रहा है शाह की 'मिशन' में रोड़ा?
दरअसल शिवराज के धूर विरोधी माने जाने वाले कैलाश विजयवर्गिय को अमित शाह ने अपनी राष्ट्रीय टीम में जगह देकर सूबे में शिवराज को खुला राज सौंपा था। कैलाश तो शाह की टीम में स्थान पाकर राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की सेवा में जुट गए हैं। मगर पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल गौर, गौरी शंकर बिशेन, यशोधरा राजे सिंधिया, सरताज सिंह, पूर्व वित्त मंत्री राघव जी और व्यापम घोटाले में नामजद रहे पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा सरीखे करीब आधा दर्जन नेता ऐसे हैं जो कि अगले विधानसभा चुनाव में अपना राजनीतिक भविष्य समाप्त मान रहे हैं।
यहि वजह है कि ये नेता चुनावी माहौल से पहले दबाव बनाकर भविष्य के लिए मोल-भाव कर लेना चाहते हैं। इसलिए इन नेताओं की कार्यप्रणाली ऐसी हो गई है कि ये पार्टी का माहौल सूबे में खड़ा नहीं होने दे पा रहे हैं। माहौल बनने के शुरुआत में ही ये विवादित बयान देकर पार्टी की कोशिशों को बेपटरी कर दे रहे हैं।
बीते दिनों यशोधरा के जरिए पार्टी कार्यकर्ता से बदतमीजी का मामला सामने आया था। तो बिशेन ने पार्टी सांसद को सरेआम झिड़क दिया था। तो सरताज भी विवादित बयान देकर सुर्खियों में हैं। चंद दिनों पहले पेट्रोल के दामों को लेकर वित्त मंत्री जयंत मलैया को पत्र लिखकर गौर ने अपनी ही सरकार की मुश्किल बढ़ा दी थी।
वहीं एक बच्चे के शोषण के मामले में बदनाम रहे राघव जी दोबारा से अपनी एंट्री के साथ अपनी पुत्री का भविष्य भी सुनहरा बनाना चाह रहे हैं। लक्ष्मीकांत शर्मा भी शिवराज के करीबी माने जाते रहे हैं और व्यापम की आंच ठंडी होने के बाद वो राजनीतिक पारी में सक्रिय होना चाह रहे हैं।
सूबे में क्या है सीटों का गणित?
मध्यप्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में भाजपा की स्थिति बेहद मजबूत है। नवंबर 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में जीतने वाले भाजपा विधायकों की संख्या 165 थी, तो कांग्रेस के 56 विधायक चुनाव जीते थे। बसपा के खाते में 4 और 3 विधायक निर्दलिय हैं।
वर्तमान में राज्य विधानसभा की 2 सीटें रिक्त हैं जिनपर आगे उपचुनाव होने हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने वर्ष 2018 में होने वाले मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए 200 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। बीते लोकसभा चुनाव में भी पार्टी को सूबे की 25 में से 23 लोकसभा सीटों पर जीत मिली थी।
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह चाहते हैं कि प्रदेश में भाजपा का माहौल बना रहे ताकि अगले विधानसभा के साथ-साथ अगामी लोकसभा चुनाव में भी पार्टी का प्रदर्शन 2014 जैसा बना रहे। बीते माह उन्होंने प्रदेश का तीन दिवसीय दौरा भी किया था। जिसमें कुछ नेताओं को उन्होंने खरी-खोटी भी सुनाई थी। शाह ने प्रदेश में भाजपा नेताओं को लक्ष्य पर फोकस रखने की नसीहत दी थी। बावजूद उसके कुछ नेता पार्टी के माहौल में रोड़ा अटका रहे हैं।