अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ संयुक्त समग्र कार्ययोजना (दि ज्वाइंट कांप्रिहेन्सिव प्लान ऑफ एक्शन, जेसीपीओए) से पीछे हटने का दांव उल्टा पड़ सकता है। कूटनीति के जानकारों के मुताबिक अमेरिका ने यह कदम ईरान की बांह मरोड़ने के ईरादे से उठाया है। अमेरिका और इजरायलइस मुद्दे पर साथ हैं और इसका कनेक्शन सीरिया में बसर अल अशद की सरकार को सत्ता से हटाने के लिए चल रही वर्चस्व की जंग से भी जोड़कर देखा जा रहा है। इससे जहां चीन को ईरान के करीब जाने का अवसर मिलेगा, वहीं दुनिया में नई जिओपॉलिटिक्स उभरने के संकेत मिल रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव जनरल एंटोनियो गुटेरेस ने अमेरिका के इस कदम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे युद्ध का खतरा बताया है। एंटोनियो ने अमेरिका को चेताते हुए कहा है कि वह जेसीपीओए से पीछे न हटे। उन्होंने कहा कि 2015 में हुए जेसीपीओए को संरक्षित न किया गया तो युद्ध का खतरा पैदा हो सकता है। हालांकि एंटोनियो के इस डरावने अंदाज से भारतीय कूटनीति के जानकार इत्तेफाक नहीं रखते।
पर्व विदेश सचिव शशांक के अनुसार उन्हें उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच में बन रही संभावना को देखते हुए इस तरह कोई खतरा नहीं है, लेकिन युद्ध जैसी स्थितियां जरूर आ सकती है। अमेरिका लगातार अपने हितों को सहेजने में लगा है। इसी नीति पर ब्रिटेन भी चल रहा है। उसने संरक्षण नीति को बढ़ावा देते हुए खुद को यूरोपीय यूनियन से अलग कर लिया है। शशांक कहते हैं कि अमेरिका की मौजूदा कोशिश ईरान पर दबाव बनाकर अपने हितों के अनुरूप नए समझौते का प्रारुप तैयार कराकर उस पर दस्तखत कराने की है।
जेसीपीओए पर स्थिति
अमेरिका ने 14 जुलाई 2015 को ईरान के साथ हुए परमाणु करार से कदम पीछे खींच लिया है। इस तरह से अमेरिका अब जेसीपीओए से पीछे हट चुका है। जबकि पी5+1 के शेष सभी पांच देश(रूस, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और चीन) अभी ईरान के साथ हैं। फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी के विदेश मंत्रालय ने संयुक्त वक्तव्य जारी करके कहा है कि वह इस ऐतिहासिक समझौते का पालन करेंगे।
अमेरिका के पीछे हटने के बाद भी वह जेसीपीओए पर कायम है। ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने भी अमेरिका के कदम की आलोचना करते हुए सुरक्षा परिषद के पांच अन्य देशों के साथ समझौते पर बने रहने की प्रतिबद्धता जताई है। अमेरिका के राष्ट्रपति के इस कदम को लेकर पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भी उनके कदम की आलोचना की कर रहे हैं।
जेसीपीओए से क्यों पीछे हटा अमेरिका
Donald Trump
इसकी पृष्ठभूमि में इजरायल है। इजरायल का कहना है कि परमाणु समझौते की आड़ में ईरान ने परमाणु हथियारों का विकास किया है और विकास करने के साथ-साथ अपनी ताकत बढ़ाई है। इजरायलने इसके बाबत अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो की इजरायल यात्रा के दौरान उन्हें एक गोपनीय रिपोर्ट दिखाई है। पोम्पियो ने इस रिपोर्ट को सही बताया है। अमेरिका पहले से इस तरह का आरोप लगा रहा था और अंत में उसने पीछे हटने का फैसला कर लिया। इजरायल नहीं चाहता कि ईरान उसके पड़ोस में रहने के साथ-साथ ताकतवर बने। सीरिया में ईरान की मौजूदगी और ईरान का बढ़ दखल उसे अखर रहा है।
दूसरी बड़ी वजह अमेरिका में दो साल बाद होने वाला राष्ट्रपति चुनाव हो सकता है। डोनाल्ड ट्रंप दूसरा कार्यकाल चाहते हैं। ट्रंप ने इस समझौते को लेकर पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा पर सवाल खड़ा कर दिया है। तत्कालीन विदेश मंत्री जॉन कैरी को ईरान के साथ वार्ता से दूर रहने और उन्हें अमेरिका के आर्थिक हितों को नुकसान न पहुंचाने के लिए चेता रहे हैं। इस तरह ट्रंप अमेरिका के आर्थिक हितों की रक्षा के साथ पूर्ववर्ती सरकार के विदेश नीति की सख्त आलोचना कर रहे हैं।
चीन का दखल
शशांक का कहना है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां, वैश्विक मामलों में आगे बढ़ने के तरीके काफी हटकर हैं। वह पूरी तरह से अनप्रेडिक्टेबिल हैं। उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हमेशा टकराव के मूड में रहते हैं। ट्रंप के आगे बढ़ने का अनुमान लगा पाना भी काफी कठिन हैं। कई बार वह एक बिजनेसमैन की तरह व्यवहार करते नजर आते हैं।
पूर्व विदेश सचिव का कहना है कि इसका अमेरिका के लिए फायदा भी है और नुकसान भी। फिलहाल ईरान के साथ बढ़ रहे टकराव का चीन को फायदा मिल सकता है। वैसे भी सीरिया संकट को लेकर रूस, चीन और ईरान सीरिया के साथ हैं। दक्षिण चीन सागर में अमेरिका चीन के कदम का विरोध कर रहा है और चीन आगे बढ़ रहा है।
इस तरह से चीन के लिए एक बार फिर बड़ा अवसर है कि ईरान के साथ अपने रिश्ते को नये मुकाम पर ले जाकर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्थिति को नई मजबूती दे। शशांक का भी मानना है कि रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन चौथी बार शपथ ले चुके हैं। पुतिन ने सोवियत संघ से अलग होने के बाद रूस को नई ऊंचाइयां दी है।
भारत की स्थिति
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भारत ने ईरान के शांतिपूर्ण ऊर्जा परमाणु कार्यक्रम का समर्थन करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस मुद्दे को शांतिपूर्वक संवाद तथा कूटनीतिक तरीके से हल करने की अपील की है। भारत का मानना है कि ईरान को शांतिपूर्ण उद्देश्यों में परमाणु ऊर्जा के उपयोग करने का अधिकार है। विश्व समुदाय भी यही चाहता है। इसलिए इस मुद्दे पर किसी तरह के तनाव की स्थिति से बचते हुए संवाद के जरिए परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मसले का हल निकाला जाना चाहिए। फिलहाल भारत तटस्थ है।
माना जा रहा है कि भारत ने अपनी कूटनीति में थोड़ा सा बदलाव किया है। भारत ने सभी देशों के साथ संतुलित रिश्ते पर जोर दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के दो दिवसीय अनौपचारिक मुलाकात को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। पूर्व विदेश सचिव शशांक भी इसे अहम मान रहे हैं। अमेरिका के साथ रिश्तों के संतुलन को देखकर भारत ने रूस और चीन के साथ अपने रिश्ते की अहमियत को जगह दी है। शशांक का मानना है कि भारत ने अमेरिका को संदेश दे दिया है कि वह रूस के साथ अपने रक्षा सहयोग में शिथिलता लाने में असमर्थ है।
क्या होगा आगे
ईरान समेत अन्य परमाणु ऊर्जा सेफगार्ड एजेंसी आईएईए के पास जा सकते हैं। आईएईए से जांच करके रिपोर्ट देने तथा अमेरिका द्वारा लगाए आरोपों का निदान करने के लिए कह सकते हैं। ईरान का लगातार कहना है कि अमेरिका उस पर मनगढ़ंत आरोप लगा रहा है। आईएईए के महानिदेशक युकिया अमानो ने फिलहाल ईरान को क्लीन चिट दे दी है। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी के सवाल का जवाब देते हुए अमानो ने कहा है कि ईरान परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के संदर्भ में ईरान ने अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा किया है। आईएईए के महानिदेशक के इस बयान ईरान के पक्ष में विश्व समुदाय को खड़ा होने में बड़ी सहायता की है।
अमेरिका का झूठ
अमेरिका का झूठ कई बार उजागर हुआ है। इसलिए कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार अमेरिका के लिए स्थिति बहुत अनुकूल नहीं है। इराक के पास परमाणु हथियारों का जखीरा बताकर अमेरिका ने वहां बहुराष्ट्रीय सेनाओं के साथ हमला किया था। लेकिन इराक के पास परमाणु हथियार के अब तक कोई संकेत नहीं मिले। आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन का सच भी छिपा नहीं है। आईएसआईएस की कमर रूस द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई में टूटी है। अमेरिका द्वारा इराक, लीबिया, सीरिया में सैन्य कार्रवाई को लेकर विश्व स्तर पर अब भी बहस जारी है। इसे अमेरिका की दादागिरी से जोड़कर देखा जा रहा है। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि यही कारण है कि ईरान के मामले में पी5ऋ1 के सदस्य देश भी संभलकर आगे बढ़ रहे हैं।
अलग-थलग पड़ सकता है अमेरिका
अमेरिका ने जिस इरादे से ईरान पर दबाव बनाने की पहल की है, उसकी कोशिशों को करारा झटका लग सकता है। कूटनीति के जानकारों का मानना है कि नई जिओपालिटिक्स उभर रही है। रूस के राष्ट्रपति ने चौथा कार्यकाल के लिए शपथ ली है। अभी सीरिया में चल रहे संघर्ष का भी अंत होना है। रूस सीरिया रासायनिक हमले का आरोप लगाकर अमेरिका समेत अन्य द्वारा की गई बमबारी से खफा भी है। चीन रूस का समर्थन कर रहा है। ईरान की सेना सीरिया में है। वह विद्रोहियों से मुकाबले का समर्थन कर रही है। दक्षिण चीन सागर में चीन वर्चस्व चाहता है। यहां अमेरिका के साथ उसकी टकराव की स्थिति है। उत्तर कोरिया और अमेरिका बातचीत की मेज पर आ रहे हैं। उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग ऊन का चीन पर भरोसा है। चीन की मंशा ईरान में बड़े पैमाने पर निवेश तथा अपना दखल बढ़ाने की है। इसी इरादे से चीन ने ईरान को शंघाई सहयोग संगठन में शामिल होने के लिए आमंत्रित कर दिया है। इन सब परिस्थितियों के सामनांतर कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि ईरान के पास अमेरिका के आगे दबने जैसी स्थिति नहीं आनी चाहिए। ऐसा होने पर अमेरिका के मंसूबे पर पानी फिर सकता है। अमेकिा के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दांव उल्टा पड़ सकता है।