फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विशेष: मां कामाख्या धाम में 'अंबुवासी महायोग' शुरू, 26 को प्रसादम वितरण के बाद खोले जाएंगे कपाट

सार

श्रद्धालुओं को ठहरने के लिए जगह-जगह व्यवस्था की गई है।देश और दुनिया से आने वाले भक्तों, संतो, साधुओं और स्थानीय लोगों को किसी तरह की परेशानी नहीं हो इसके लिए महानगर प्रशासन ने भी कमर कस ली है।
विज्ञापन
Maa Kamakhya Dham - फोटो : Social Media
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

प्रकृति के गोद में बसे असम के शहर गुवाहाटी के नीलाचल की पहाड़ियों पर स्थित है विश्व प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां कामाख्या धाम। मां कामाख्या धाम को फूलों से बहुत ही सुंदर ढंग से सजाया गया है। कामाख्या धाम के कपाट दर्शनार्थियों के लिए बंद कर दिए गए हैं। शक्तिपीठ कामाख्या धाम में गुरुवार की देर रात को 'अंबुवासी महायोग' का आगाज हुआ। इसी के साथ तंत्र साधकों के सैकड़ों हवन कुंड प्रज्ज्वलित हो उठे। इसके साथ ही शुरू हो गया है चार दिवसीय अंबुवासी मेला।
विज्ञापन


मंदिर के कपाट 26 को प्रसादम वितरण के बाद खोले जाएंगे। इसके बाद मां के दर्शन हो पाएंगे। इस दौरान देश और दुनिया के तंत्र साधक यहां आते हैं और तंत्र-मंत्र की सिद्धी करते हैं। इस मंदिर को तंत्र साधना का प्रमुख स्थान माना जाता है। इनके अलावा इस बार भी लाखों श्रद्धालुओं यहां पहुंचे हैं। मां के जयकारों से गूंज रही हैं नीलाचल की पहाड़ियां। व्यवस्था में किसी तरह की खलल नहीं पड़े इसके लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम भी किए गए हैं।

श्रद्धालुओं को ठहरने के लिए जगह-जगह व्यवस्था की गई है।देश और दुनिया से आने वाले भक्तों, संतो, साधुओं और स्थानीय लोगों को किसी तरह की परेशानी नहीं हो इसके लिए महानगर प्रशासन ने भी कमर कस ली है। आइए, जानते हैं आखिर क्यों बंद की जाती हैं कामाख्या धाम की कपाट।
विज्ञापन


मां हो जाती हैं रजस्वला, तीन दिन बंद रहेंगे कपाट
देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक है कामख्या देवी शक्तिपीठ। मान्यता है कि जब सुदर्शन चक्र से कटकर देवी सती के अंग भूमि पर गिरे थे, तब योनी भाग यहां गिरा था। यही वजह है कि इसे कामक्षेत्र, कामरूप यानी कामदेव का क्षेत्र भी कहा जाता है। जिस स्थान पर देवी सती का योनी भाग गिरा था उस स्थान (नीलाचल पहाड़, जो गुवाहाटी से करीब 14 किलोमीटर दीर है) पर विश्व प्रसिद्ध कामख्या देवी का प्राचीन मंदिर है।

इस मंदिर को तंत्र साधना का प्रमुख स्थान माना जाता है। हर वर्ष देश और दुनिया से तंत्र-मंत्र साधक अंबुवासी मेले में आते हैं। मां तीन दिनों के लिए रजस्वला हो जाती हैं, इसलिए इस दौरान मां के दर्शन नहीं होते। मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। यह मेला इस बार शुक्रवार से शुरू हो गया है।

इस बार प्रवृत्ति रात दो बजे शुरू हुई
मंदिर प्रबंधन के मुताबिक इस साल अंबुवासी मेले के लिए मंदिर के कपाट 22 जून को बंद हो हो गए। साथ ही रात में 2 बज कर 30 मिनट और 42 सेकेंड पर प्रवृति शुरू हुई और 26 जून की सुबह 7 बजकर 51 मिनट और 58 सेकेंड पर निवृति होगी। इस दौरान अंबुवासी मेले का आयोजन किया जाएगा। 26 जून को ही देवी के पूजा स्नान के बाद मंदिर के द्वार खुले जाएंगे।

अंबुवासी मेले का नाम इसलिए पड़ा
भक्तों को प्रसाद के रूप में कपड़ा दिया जाता है। इसे अंबुवासी कहते हैं। इसी कारण इस मेले का नाम अंबुवासी मेला कहा जाता है। मान्यता के मुताबिक मां (देवी) के रजस्वला होने के दौरान प्रतिमा के आस-पास सफेद कपड़ा बिछा दिया जाता है। तीन दिन बाद जब मंदिर के दरवाजे खोले जाते हैं, तब वह वस्त्र माता के रज से लाल होता है। कहा जाता है कि जिस भी भक्त को यह वस्त्र मिलता है, उसके सारे कष्ट दूर हो जाता हैं। हर साल जून के महीने में यह मेला लगता है।

नहीं जोते जाएंगे खेत, नहीं होगी पूजा
मां कामाख्या धाम मंदिर के कपाट बंद होने के साथ ही किसानी से संबंधित सारे काम बंद हो जाते हैं। चार दिन तक हल नहीं चलेंगे, खेत जोते नहीं जाएंगे। बगीचे में किसी भी तरह के फल या सब्जी तोड़े नहीं जाएंगे। बाजार में वही सब्जी आएंगी, जो पहसे तोड़ी गई है। इस दौरान घरों और मंदिरों में पूजा नहीं की जाएगी। कोई भी धार्मिक कार्य नहीं होंगे, केवल तपस्या की जा सकती है। रात नौ बजे से नीलांचल की पहाड़ियों में किसी भी प्रकार के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई है।

उमानंद के दर्शन के बिना दर्शन अधूरी
देवी के मंदिर के पास ही ब्रह्मपुत्र नदी के बीचों-बीच उमानंद भैरव का भव्य मंदिर है। मान्यता है कि इनके दर्शन के बिना कामाख्या देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है। इस मंदिर की प्रसिद्ध इसकी वास्तुशिल्प के कारण भी है। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर को किसी इनसान ने नहीं बल्कि यह गर्भ से निकला है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें