अमरमणि त्रिपाठी की सियासी राह मुश्किल
दरअसल मधुमिता शुक्ला की हत्या में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे अमरमणि त्रिपाठी को अब जेल से निकाला जा रहा है। राजनीतिक जानकार और वरिष्ठ पत्रकार जीडी शुक्ला कहते हैं कि अमरमणि त्रिपाठी की रिहाई उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में सिर्फ इसलिए चर्चा का विषय है क्योंकि वह जब जेल गए थे तो बड़े नेता माने जाते थे। उनके जेल जाने के बाद न सिर्फ उत्तर प्रदेश की सियासत बदली बल्कि जिस तरह बाहुबलियों की राजनीति अमरमणि करते थे उसकी पूरी परिभाषा बदल गई। इसलिए यह कहना कि अमरमणि त्रिपाठी की जेल से रिहाई के बाद अब उनको राजनीतिक दल हाथों-हाथ लेंगे ऐसा मुश्किल लग रहा है। इसके पीछे तर्क देते हुए शुक्ला कहते हैं कि दरअसल अमरमणि त्रिपाठी के ऊपर जो दाग लगा है वह कोई भी राजनीतिक दल सीधे तौर पर उनको अपने साथ जोड़कर नहीं लेना चाहेगा। हालांकि अमरमणि त्रिपाठी अपने सियासी सफर में कई राजनीतिक दलों से जुड़े रहें हैं।
कभी पूर्वांचल की राजनीति में था अमरमणि त्रिपाठी का दबदबा
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अमरमणि त्रिपाठी पूर्वांचल के बड़े ब्राह्मण चेहरे के तौर पर एक पहचान रखते थे। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक यासीन अहमद कहते हैं कि जब कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब अमरमणि त्रिपाठी उनकी कैबिनेट में मंत्री हुआ करते थे। लेकिन इस दौरान अपहरण के एक मामले में नाम शामिल होने पर उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया गया था। उसके बाद त्रिपाठी ने अपने सियासी रसूख को कायम रखने के लिए बसपा से लेकर समाजवादी पार्टी तक का दामन थाम लिया। वह कहते हैं कि सभी राजनीतिक दल अमरमणि के पूर्वांचल में उनके ब्राह्मण चेहरे पर मिलने वाले वोट और दबदबे के कारण सियासत में तवज्जो भी देते थे। लेकिन मधुमिता हत्याकांड के बाद जेल गए अमरमणि त्रिपाठी का सियासी सफर न सिर्फ खत्म हुआ बल्कि उनका वह रुआब भी उनके इलाके से जाता रहा। यासीन कहते हैं कि अब जेल से वापस आने के बाद अमरमणि त्रिपाठी के लिए सियासी राह इतनी आसान नहीं होगी जितनी की जेल जाने से पहले हुआ करती थी। वह भी मानते हैं कि कोई भी राजनीतिक दल अब अमरमणि पर सीधे तौर पर बड़ा दांव लगाने से बचेगा।
जातीय समीकरणों पर नहीं होगा खास असर
जेल से रिहा होने के आदेश की चर्चाओं के दौरान ही उत्तर प्रदेश की सियासत में कहा यह जाने लगा कि क्या बड़े ब्राह्मण चेहरे के तौर पर अमरमणि को कोई भी राजनीतिक दल आगे कर सकेगा। इसको लेकर सियासी जानकार बताते हैं कि अगर अमरमणि को बतौर ब्राह्मण चेहरा आगे किया जाएगा तो जिसकी हत्या में उनको जेल हुई थी वह कवियत्री भी ब्राह्मण ही थी। वरिष्ठ पत्रकार जीडी शुक्ला कहते हैं कि ऐसे में बतौर ब्राह्मण चेहरे के तौर पर शायद ही कोई राजनीतिक दल अमरमणि त्रिपाठी पर बड़ा दांव लगाए। दरअसल उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों की राजनीति में भी अब कई बड़े चेहरे अलग-अलग सियासी दलों के सामने हैं। वह कहते हैं कि मधुमिता शुक्ला उत्तर प्रदेश के लखीमपुर की रहने वाली थी। ऐसे में अब जो भी राजनीतिक दल अमरमणि त्रिपाठी को बतौर ब्राह्मण चेहरे के तौर पर आगे लाने की कोशिश करेगा तो उसको जातिगत समीकरणों के आधार पर बड़े विरोध का सामना भी करना पड़ सकता है। ऐसे में अमरमणि त्रिपाठी के लिए ब्राह्मण चेहरे के नाम पर लगने वाला सियासी दांव तो शायद ही बहुत बड़े स्तर पर काम करे।
विधानसभा सीट पर अभी भी असर बरकरार
दरअसल राजनीतिक गलियारों में अमरमणि त्रिपाठी की जेल से आने के बाद सक्रिय राजनीति को लेकर कयास इसीलिए लगाए जा रहे हैं क्योंकि वह कई सियासी दलों में रह चुके हैं। त्रिपाठी ने 1996 में पहली बार कांग्रेस से नौतनवां से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। 1997 में वह कांग्रेस को छोड़कर लोकतांत्रिक कांग्रेस में शामिल हुए और फिर कल्याण सिंह की सरकार में मंत्री बना दिए गए। बाद में अमरमणि त्रिपाठी बहुजन समाज पार्टी के साथ आ गए। उसके बाद वह समाजवादी पार्टी का दामन थाम कर मुलायम सिंह की सरकार में उत्तर प्रदेश के एक बार फिर से मंत्री बन गए। कभी लोकतांत्रिक कांग्रेस में शामिल रहे अमरमणि त्रिपाठी के करीबी पूर्वांचल के नेता ओमशरण सिंह कहते हैं कि अमरमणि त्रिपाठी का सियासी वजूद अभी भी अपनी विधानसभा और इलाके में बरकरार है। वह अब पूरे पूर्वांचल पर भले कोई बड़ी सियासी छाप न छोड़ सकें लेकिन अमरमणि के वापस आने से उनके इलाके में राजनीतिक लड़ाई तो निश्चित तौर पर दिलचस्प ही होगी।