अमर उजाला शब्द सम्मान में कवि-उपन्यासकार भालचंद्र नेमाडे ने कहा कि अत्यंत सुखद है कि अमर उजाला परिवार भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहित करने हेतु इन भाषाओं के साहित्यकारों का सम्मान कर एक आदर्श स्थापित कर रहा है। वैसे, हिंदी मुझे कभी परायी भाषा नहीं लगी। मेरे साहित्य के सर्वाधिक अधिक अनुवाद हिंदी में ही हुए हैं। सन 1960 में मैंने मराठी लघु पत्रिका यानी लिटिल मैगजीन से अपना लेखन आरंभ किया था। इस समय हिंदी में भी लघु पत्रिका आंदोलन जोरों पर था। उसी में मेरे साहित्य का अनुवाद प्रकाशित होता था। आवेश, लहर, गवाह, आश्वस्त, पल-प्रतिपल और बाद में पूर्वग्रह, आलोचना, बहुवचन, समीक्षा आदि। हिंदी हो, मराठी हो, सभी भारतीय भाषाओं का माध्यम यानी सोचने की प्रज्ञा एक जैसी है।
मराठी के संत नामदेव, तुकाराम से लेकर विनोबा भावे, गजानन माधव मुक्तिबोध तक बड़े-बड़े साहित्यकारों ने हिंदी को अपनी ही भाषा माना है। संत तुलसीदास और संत एकनाथ तो काशी में सहपाठी थे और दोनों ने बाद में अत्यंत लोकप्रिय रामायण ग्रंथों की रचना की है। साहित्य निर्मिति सुखद प्रसंग तो है ही, मेरे लिए वह प्रसव पीड़ा जैसा वेदनामयी भी है। लिखते समय मैं एक मां बनने के खास अनुभव से गुजरता हूं। हम पुरुषों को अपनी बांझ जिंदगी में सृजन की, प्रसव की वेदना अनुभव करने का अन्य दूसरा अवसर नहीं मिलता।
हां, बाद में जैसे कोई हमारे बच्चों का कौतुक करता है, कुछ ऐसा ही अनुभव उजाला परिवार द्वारा हो रहे इस सम्मान से मैं कर रहा हूं। ऐसे अवसर पर मुझे अपने मां बनने पर गर्व महसूस होता है। मेरे सामने मुख्यत: वह पाठक होता है, जो ग्रामीण है, सुविधाओं से वंचित है, मेहनतकश है, असहाय है, मगर जिंदगी से प्यार करता है। यानी मेरा पाठक समाज की निचली सतह से आता है। क्योंकि हमेशा निचली सतह पर ही नमी होती है, जिंदादिली होती है। जैसे-जैसे हम ऊंचाई की तरफ बढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे यथार्थ विरल होता जाता है। मगर निचली सतह पर ही सच्चे अर्थ में जीवन की विविधता बसती है। फैज अहमद फैज कहते हैं-
दोस्तों को भी मिले दर्द की दौलत यारब,
मेरा अपना ही भला हो, मुझे मंजूर नहीं।
मेरी बंबइया हिंदी, जो हम सबकी बोली है, वही सच्चे अर्थ में राष्ट्रभाषा है। इसमें बोलने वाला कोई गलती कर ही नहीं सकता। पूरे भारत में 1652 स्वतंत्र भाषाएं बोली जाती हैं। यूएनओ को सर्वे करना चाहिए कि हर देश में सौ साल पहले कितनी भाषाएं जिंदा थीं, आज कितनी जिंदा हैं। हमारा यह फर्ज होना चाहिए कि दुनिया में जितनी भी छोटी-छोटी भाषाएं हैं, सब जिंदा रहें। एक भी भाषा मरने न पाए। क्योंकि हर भाषा लाखों सालों से अपने साथ एक जीवनदृष्टि उत्क्रांत करते-करते विकसित होती है। लेकिन आज हमारे देश में गांव-देहातों तक अंग्रेजी माध्यम पढ़ाई फैल रही है। हमारी देसी भाषाओं की अहमियत कम होती जा रही है। असल में ये भाषाएं दुनिया में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाती हैं, मगर अपने आपको संस्कृति रक्षक कहलवाने वाली सरकारें भी अंग्रेजी को ही बढ़ावा दे रही हैं।
भारतीय संस्कृति का ढोल पीटने वाली पार्टियों में भी अपनी भाषा के प्रति प्यार नहीं है। दुनिया में किसी भी गैर-अंग्रेजी मातृभाषा वाले देश में अंग्रेजी का इस्तेमाल नहीं होता। जर्मनी और फ्रांस की बात छोड़िए, चीन, जापान, कोरिया-कहीं भी अंग्रेजी का इस्तेमाल नहीं होता। मातृभाषा से ही दुनिया का सही मायने में परिचय होता है। अंग्रेजी से ज्ञान नहीं मिलता, मिलती है बस जानकारी। गांधीजी ने सन 1907 में हिंद स्वराज पुस्तक में लिखा था, अंग्रेजी ने हिंदुस्तानी जनता को गुलाम बना दिया है। आज हम 2019 में भी अंग्रेजी के गुलाम ही हैं। हिंदुस्तान में अंग्रेजी युग शुरू होने से पहले हमारी संस्कृति दुनिया में उच्च मूल्य की संस्कृति के रूप में पहचानी जाती थी। अब वह दुनिया की एक निम्न मूल्य की संस्कृति समझी जाती है।
मेरा पाठक समाज की निचली सतह से आता है। क्योंकि हमेशा निचली सतह पर ही नमी होती है, जिंदादिली होती है। जैसे-जैसे हम ऊंचाई की तरफ बढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे यथार्थ विरल होता जाता है। हमारा फर्ज है...दुनिया में जितनी भी छोटी-छोटी भाषाएं हैं, सब जिंदा रहें। एक भी मरने न पाए। क्योंकि हर भाषा लाखों सालों से अपने साथ एक जीवनदृष्टि उत्क्रांत करते-करते विकसित होती है। मातृभाषा में पढ़ाई करने से ही दुनिया का सही मायने में परिचय होता है, ज्ञान मिलता है।