जनहित याचिकाएं सार्वजनिक हित की रक्षा करने की बजाए अब राजनीतिक हित साधने का जारिया बन गई हैं। अमर उजाला पोल के जरिए ये राय स्पष्ट हुई है। शुक्रवार को पूछे गए सवाल 'क्या जनहित याचिकाओं को राजनीतिक हित साधने का औजार बना लिया गया है?' पर पाठकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और 80% से ज्यादा लोगों ने यही माना है कि ये कानूनी प्रक्रिया राजनीति साधने का औजार बन गया है। 20% लोग ही ऐसे हैं जो अभी सार्वजनिक हित की रक्षा के लिए इस प्रक्रिया पर भरोसा करते हैं।
जनहित याचिका भारतीय संविधान या किसी कानून में परिभाषित नहीं है, यह उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक व्याख्या से बना है। जनहित याचिकाओं का सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि इसने कई तरह के नवीन अधिकारों को जन्म दिया। जनहित याचिका अन्य सामान्य अदालती मुकदमों से भिन्न है और इस में यह आवश्यक नहीं कि पीड़ित पक्ष स्वयं अदालत में जाए।
यह किसी भी नागरिक द्वारा पीड़ितों के पक्ष में किया गया मुकदमा है। स्वयं न्यायालय भी किसी सूचना पर संज्ञान लेकर इसे आरम्भ कर सकता है। इस तरह के अब तक के मामलों ने कारागार और बन्दी, सशस्त्र सेना, बालश्रम, बंधुआ मजदूरी, शहरी विकास, पर्यावरण और संसाधन, ग्राहक मामले, शिक्षा, राजनीति और चुनाव, लोकनीति और जवाबदेही, मानवाधिकार और स्वयं न्यायपालिका के व्यापक क्षेत्रों को प्रभावित किया है।
न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका का विस्तार बहुत हद तक समानान्तर रूप से हुआ है और जनहित याचिका का मध्यम-वर्ग ने सामान्यत: स्वागत और समर्थन किया है। अमर उजाला पोलिंग पाठकों की सहभागिता से विशेष विषयों पर स्पष्ट राय निकालने की एक कोशिश है। इसीलिए इस मुद्दे को आपके बीच रखा गया। अमर उजाला पोल के साथ आप जुड़े रहें क्योंकि आपकी राय से ही देश को मिलेगी नई दिशा।