अमर उजाला बतरस एक और हफ्ते आम लोगों की जिंदगी से जुड़े अहम मुद्दे के साथ हाजिर है। इस हफ्ते पॉडकास्ट में चर्चा हुई भारतीय संस्कृति, सनातन और इसे जीवंत रखने वाले 'त्योहारों' पर। भारत उन चुनिंदा देशों में से है, जिनमें लगभग हर वर्ग और हर संस्कृति से जुड़े लोग साथ मिलकर त्योहार मनाते आए हैं। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में वैश्विकरण के बढ़ते दायरे की वजह से भारत में जोर-शोर से मनाए जाने वाले त्योहारों की संस्कृति धीरे-धीरे नई पीढ़ी की पहुंच से दूर होती जा रही है। एंकर नंदिता कुदेशिया ने इस हफ्ते बतरस में इसी मुद्दे को लकर दो विशेषज्ञों से बात की और जाना की आखिर त्योहारों को सनातन की आत्मा क्यों माना जाता है।
इस पूरे पॉडकास्ट को आप शनिवार रात आठ बजे अमर उजाला के सभी सोशल मीडिया हैंडल्स पर सुन सकते हैं।
नंदिता कुदेशिया ने अमर उजाला के स्टूडियो में जिन दो विशेषज्ञों से चर्चा की, उनमें ज्योतिषी शैलेन्द्र पांडेय के साथ लेखिका-सामाजिक कार्यकर्ता सांत्वना श्रीकांत शामिल रहीं। दोनों ही विशेषज्ञों ने कई अहम सवालों के जवाब दिए। मसलन- कैसे त्योहार सनातन की आत्मा हैं? हमारे त्योहार कैसे सनातन को जीवंत रखते हैं? युवा पीढ़ी को कैसे संस्कृति से जोड़ें? त्योहारों का वैज्ञानिक कनेक्शन क्या है?
बतरस में विशेषज्ञों ने न सिर्फ इन सवालों के जवाब दिए, बल्कि यह भी बताया कि मौजूदा समय में भारतीय त्योहार कैसे सनातन को पूरी दुनिया में बढ़ा रहे हैं। साथ ही त्योहारों से सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण कैसे हो रहा है। भारतीय त्योहारों को महत्व दुनिया किस तरह मानने लगी है और आधुनिक पीढ़ी त्योहारों की परंपरा से कितनी जुड़ी हुई है।
इस पूरी बातचीत में मेहमानों ने डिजिटल युग में त्योहार मनाने के तरीकों का भी जिक्र किया। साथ ही यह भी बताया कि त्योहार भारतीय संस्कृति के विस्तारक कैसे बन गए।