अमर उजाला बतरस एक और हफ्ते आम लोगों की जिंदगी से जुड़े अहम मुद्दे के साथ हाजिर है। इस हफ्ते पॉडकास्ट में चर्चा हुई एक सामाजिक बुराई- दहेज प्रथा की। दरअसल, कुछ समय पहले ही उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में एक युवक के कथित तौर पर अपनी पत्नी को जलाकर मारने से जुड़ा केस सामने आया था। इस मामले में पुलिस की जांच जारी है। इस बीच इस घटनाक्रम ने दहेज प्रथा पर बहस को जन्म दे दिया। एंकर नंदिता कुदेशिया ने इस हफ्ते बतरस में इन्हीं चुनौतियों को लेकर दो विशेषज्ञों से बात की और जाना कि आखिर कड़ा कानून होने के बावजूद परंपरा के नाम पर अपराध का सिलसिला क्यों जारी है।
इस पूरे पॉडकास्ट को आप शनिवार रात आठ बजे अमर उजाला के सभी सोशल मीडिया हैंडल्स पर सुन सकते हैं।
नंदिता कुदेसिया ने अमर उजाला के स्टूडियो में जिन दो विशेषज्ञों से चर्चा की, उनमें सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रेखा अग्रवाल और सामाजिक कार्यकर्ता बरखा त्रेहान शामिल रहीं। दोनों ही विशेषज्ञों ने कई अहम सवालों के जवाब दिए। मसलन- पुरुष-महिलाओं के समान अधिकार की कोशिश में दहेज कितना बड़ा रोड़ा है? क्यों नहीं लोगों में दहेज अधिनियम, कड़े कानून को लेकर डर है? क्या नई पीढ़ी तय करने ले कि दहेज बंद हो तो संभव है ये खत्म होगा? सजा की प्रक्रिया जटिल होने से इसे रोकना मुश्किल हो रहा है और दहेज अधिनियम के तहत क्या-क्या प्रावधान हैं?
बतरस में विशेषज्ञों ने न सिर्फ इन सवालों के जवाब दिए, बल्कि यह भी बताया कि घरेलू हिंसा बंद कैसे हो सकती है और आम लोग इस पर क्या कदम उठा सकते हैं। दोनों पक्षों के अभिभावकों को दहेज पर क्या करना चाहिए। घरेलू हिंसा अधिनियम में महिलाओं के अधिकार क्या हैं और घरों में यदि इस तरह के मामले आएं तो क्या किया जाए। इसके अलावा कोर्ट कचहरी न जाना चाहें तो पीड़ित महिलाएं क्या करें?