साहित्य में हर पीढ़ी के पास संघर्ष और उपलब्धि की एक निश्चित परंपरा है। बहुत कुछ बचा रह जाता है, जो लिखा नहीं गया, बोला नहीं गया और अनकहा रह गया।
निजी और सामाजिक अनुभव की दुनिया, लिखने की ज़रूरत, समाज को देखने की कोशिश, लिख पाने का सुख, न लिख पाने की व्यथा को समझ पाना तभी संभव है जब संवाद हो, जुगलबंदी हो। ऐसा करना भविष्य की इबारत को पढ़ना भी है और उस समय को याद करना भी है, जो अब अपनी मुट्ठी में नहीं है।
पत्रकारिता में अमर उजाला की अपनी परंपरा रही है। हमने विचार किया है कि भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों के साथ खुले संवाद का एक क्रम शुरू हो। जिसमें एकाधिक साहित्यकार आपस में बात करें और अमर उजाला के संपादकीय साथी भी अपने सवाल रखें। यह एक तरह की खुली और आत्मीय बैठक है।
बैठक श्रृंखला की दूसरी कड़ी 16 अक्टूबर (सोमवार) को दिल्ली में प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह और मशहूर साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी की जुगलबंदी होगी।
'' जुगलबंदी'' एक परिचय
''जिंदगी भर बाते करता रहा, कभी लिखने के लिए, कभी न लिखने के लिए...''
नामवर सिंह हिंदी साहित्य में आलोचना के रचना पुरुष के तौर पर ख्याति प्राप्त हैं। उनकी गिनती शीर्ष शोधकार, समालोचक, निबंधकार और जाने-माने संपादकों में होती है। नामवर सिंह ने काशी हिंदू विवि, सागर विवि और जोधपुर विवि के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में लंबे समय तक अध्यापन का कार्य किया।
''मैं हमेशा मनुष्य बना रहा और वही बना रहना चाहता हूं''
विश्वनाथ त्रिपाठी लोकप्रिय शिक्षक, मध्ययुगीन काव्य के समकालीन समीक्षक और हिंदी कहानी आलोचना के महत्वपूर्ण वास्तुकार और संपादक। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के स्मरण में लिखित उनकी पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' हिंदी में अब तक लिखी गई सर्वश्रेष्ठ जीवनियों में से एक है।