इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने तीन लंबित मामलों को उच्च न्यायालयों से सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने के लिए याचिका दायर की थी। इस याचिका में ऑनलाइन गेमिंग अधिनियम, 2025 के प्रचार और विनियमन को चुनौती देने वाली याचिकाओं को तीन हाईकोर्ट से शीर्ष न्यायालय में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया गया था ताकि परस्पर विरोधी फैसलों से बचा जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन गेमिंग अधिनियम, 2025 को लेकर केंद्र की एक बड़ी मांग मान ली है। जिसके बाद अब ऑनलाइन गेमिंग अधिनियम, 2025 को लेकर देश के अलग-अलग उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होगी। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने इस अधिनियम को लेकर हाइकोर्ट्स में लंबित मामलों को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
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सोमवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस याचिका को स्वीकार कर लिया, जिसमें ऑनलाइन गेमिंग अधिनियम, 2025 के प्रचार और विनियमन को चुनौती देने वाली याचिकाओं को तीन हाईकोर्ट से शीर्ष न्यायालय में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया गया था ताकि परस्पर विरोधी फैसलों से बचा जा सके।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ केंद्र की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई करते हुए पीठ ने दिल्ली, कर्नाटक और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालयों में लंबित याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने संबंधित उच्च न्यायालयों को एक सप्ताह के भीतर दायर सभी अंतरिम आवेदनों सहित संपूर्ण रिकॉर्ड स्थानांतरित करने का निर्देश दिया।
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सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सीए सुंदरम और अरविंद दातार ने दलीलें पेश की। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद पीठ ने कहा कि डिजिटल रूप से मामलों को ट्रांसफर करने की बात कही। इसके पीछे पीठ ने समय बचाने का हवाला दिया।
गौरतलब है कि इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने तीन लंबित मामलों को उच्च न्यायालयों से सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने के लिए याचिका दायर की थी। इस याचिका में कहा गया है कि विभिन्न उच्च न्यायालयों में एक ही या लगभग समान कानूनी प्रश्न से संबंधित और एक ही अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाले कई मुकदमे लंबित होने के कारण यह आवश्यक है कि किसी भी प्रकार के मतभेद या कार्यवाही की बहुलता से बचने के लिए इसे इस न्यायालय या किसी अन्य उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया जाए।