देश में कोरोना के साथ ब्लैक फंगस (म्यूकॉरमायकोसिस) के मामले बढ़ने के साथ एम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन की मांग बढ़ती जा रही है। आइए जानते हैं ब्लैक फंगस से पीड़ित मरीजों के इलाज में इस्तेमाल हो रहा एम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन शरीर पर आखिर कैसे काम करता है जो इस जानलेवा बीमारी से बचा रहा है।
फंगस की बाहरी झिल्ली क्षतिग्रस्त
केजीएमयू, लखनऊ के फॉर्माकोलॉजी विभाग के डॉ. राकेश दीक्षित बताते हैं कि एम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन ब्लैक फंगस की सेल मेंबरेन या बाहरी झिल्ली (कोशिका झिल्ली) को नुकसान पहुंचाती है। ऐसा करने के लिए एम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन में मौजूद दवा एर्गोस्ट्रॉल को निशाना बनाती है और उसको तोड़ना शुरू कर देती है।
फंगस की बाहरी झिल्ली एर्गोस्ट्रॉल की बनी होती है। एर्गोस्ट्रॉल के क्षति के साथ ही फंगस की कोशिका झिल्ली फट जाती है जिस कारण उसकी कोशिका के भीतर मौजूद सभी प्रकार के तत्व लीक हो जाते हैं जो उसके जीवित रहने के लिए जरूरी होता है। इसी की मदद से ये दवा ब्लैक फंगस को शरीर में खत्म कर देती है।
चार से छह सप्ताह तक इंजेक्शन क्यों?
केजीएमयू के पल्मोनरी एक्सपर्ट डॉ. वेद प्रकाश बताते हैं कि ब्लैक फंगस के मरीजों को न्यूनतम चार से छह सप्ताह तक एम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन दिया जाता है। शरीर में फंगस की मात्रा के अनुरूप दवा दी जाती है। फंगस जितना बढ़ा होगा दवा की डोज उतनी ही अधिक होगी ताकि शरीर को ब्लैक फंगस से होने वाले अधिक नुकसान से बचाया जा सके।
इंजेक्शन से मानव कोशिका को नुकसान नहीं...
फॉर्मा एक्सपर्ट अंजलि सिंह बताती हैं कि फंगस की कोशिका झिल्ली एर्गोस्ट्रॉल की बनी होती है जबकि मानव कोशिकाओं की झिल्ली कोलेस्ट्रॉल की बनी होती है। इसी कारण एम्फोटेरिसिनन-बी का मानव कोशिकाओं पर कोई गंभीर दुष्प्रभाव नहीं होता है। व्यक्ति को सामान्य दुष्प्रभाव दिख सकता है लेकिन ये चिंताजनक नहीं है।
एम्फोटेरिसिन-बी के साइड इफेक्ट्स
इंजेक्शन लगने के बाद सामान्य एलर्जी वाले रिएक्शन दिख सकते हैं। जैसे की सांस में तकलीफ, चेहरे, होंठ और जीभ में सूजन। इसके अलावा त्वचा का पीला होना, मल में खून, हल्का सिरदर्द, दौरे पडऩे के साथ पीलिया भी हो सकता है। इसके अलावा कुछ लोगों में सामान्य तौर पर पेट में दर्द, नाक बहना, डायरिया इत्यादि संभव है।
डॉक्टर कैसे करते हैं इंजेेक्शन का इस्तेमाल...
एम्फोटेरिसिन-बी का इंजेक्शन ठोस पाउडर के रूप में होता है। इसे इस्तेमाल से पहले तरल पदार्थ में घोला जाता है। इंजेक्शन इंट्रावीनस (नसों) के माध्यम से देते हैं। इंजेक्शन को दिन में एक बार दो से छह घंटे तक धीरे-धीरे ड्रिप के जरिए शरीर में पहुंचाया जाता है। इंजेक्शन देने से पहले रोगी पर टेस्ट डोज का परीक्षण 20 से 30 मिनट के लिए होता है। इसका मकसद इंजेक्शन के घातक दुष्प्रभावों का पहले ही पता लगाना होता है।