अब 11 के बाद वार्ता के परवान चढने की उम्मीद
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रालोद मुखिया अजित सिंह ने राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव के लिए यूपी में कांग्रेस और सपा को समर्थन देकर दूर की चाल चली है। छोटे चौधरी का यह नया कदम सूबे में नई सियासी दोस्ती की जमीन तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। रालोद की रणनीति अपना जनाधार पुख्ता करने के लिए, खुद को भाजपा विरोधी साबित करने और सेक्युलर ताकतों के साथ खड़ा दिखाने की भी है।
11 जून को होने वाला राज्यसभा चुनाव सूबे में नए सियासी मंच का आधार बन सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस चुनाव में सपा और कांग्रेस को जीतने के लिए मदद की जरूरत थी। अजित सिंह ने यह मदद आसानी से मुहैया करा दी। अजित सिंह ने समय को पहचाना और सपा और कांग्रेस को एक मंच पर लाकर भाजपा और बसपा को सूबे में होने वाले 2017 के चुनाव में पटखनी देने की रणनीति बना डाली। रालोद ने रणनीति के तहत सपा से अजित सिंह और कांग्रेस से जयंत चौधरी को बात करने का जिम्मा सौंपा है। 2017 के लिए सपा और कांग्रेस के साथ संभावित दोस्ती का सकारात्मक रुख दिखने पर अजित सिंह ने बिना देर किए राज्यसभा और विधान परिषद के चुनाव में दोनों दलों को समर्थन देने का ऐलान कर दिया।
अब माना जा रहा है कि रालोद के इस अहसान का बदला सपा और कांग्रेस विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन कर उतार सकते हैं। रालोद के रणनीतिकारों का कहना है कि यूपी में गैर भाजपा और बसपा सियासी गठबंधन की जरुरत महसूस की जा रही है। रालोद की तरफ से यह जानकारी मिल रही है कि मुजफ्फरनगर दंगे के बाद यूपी में दरका जाट मुसलिम गठजोड़ भी इससे मजबूत किया जा सकता है। रालोद संदेश देना चाहता है कि उसने राजयसभा चुनाव में भाजपा जैसे दल को छोड़कर सेक्युलर दल सपा और कांग्रेस को समर्थन दिया है।
गौरतलब है कि 2017 के लिए रालोद मुखिया अजित सिंह, सपा नेता मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव की एक दौर की वार्ता हो चुकी है। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी और रालोद के युवा चेहरा जयंत चौधरी की मीटिंग भी हो गई है। राज्यसभा चुनाव के लिए दोनों में लगातार संपर्क बना हुआ है। माना जा रहा है कि राज्यसभा चुनाव के बाद यूपी में चुनावी समीकरणों का बदलना तय है।