छोटे चौधरी के करीबियों का वोट यूपी में राजनीतिक दोस्ती वक्त की जरूरत
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राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह राज्यसभा चुनाव में सपा को समर्थन देने के बदले गठबंधन की मंजिल हासिल करना चाहते हैं। छोटे चौधरी के करीबियों का मानना है कि भाजपा और बसपा को सत्ता से दूर रखने के लिए यूपी में सपा-रालोद की दोस्ती समय की जरूरत है।
यूपी में राज्यसभा के लिए रालोद का सपा को समर्थन करना लगभग तय माना जा है। इसकी औपचारिक घोषणा होना बाकी है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक राज्यसभा चुनाव का समर्थन हासिल करने के लिए सपा की तरफ की गई पहल को लेकर रालोद से हुई वार्ता में 2017 में भी सूबे में भाजपा और बसपा को रोकने पर चर्चा हुई। सूत्रों के मुताबिक 11 जून के बाद सपा और रालोद के नेताओं के बीच गठबंधन को लेकर निर्णायक वार्ता का दौर चलेगा।
दोनों दलों के सकारात्मक रुख अपनाए जाने से उम्मीद की जा रही है कि गठबंधन परवान चढ़ सकेगा। रालोद के एक बड़े नेता का कहना है कि सपा के जनाधार इस बार 2007 वाले स्तर पर रह पाएगा इसमें संदेह है, इसलिए रालोद आदि दलों के साथ दोस्ती करने से उसकी भरपाई हो लकती है और प्रदेश में फिर से सपा की अगुवाई वाली सरकार बन सकेगी। सपा नेतृत्व को भी रालोद के वार्ताकारों ने इस खतरे का आभास करा दिया है। सूत्रों के मुताबिक सपा नेता भी इस वजह को गंभीर मान रहे हैं।
हाथ को चाहिए हाथी का साथ
राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस को अपने उम्मीदवार जिताने के लिए उत्तर प्रदेश, उततराखंड और मध्यप्रदेश में दूसरे दल के समर्थन की जरूरत है। यूपी में कपिल सिब्बल के लिए कांग्रेस के पास 29 विधायक है। जीतने के लिए 34 वोट चाहिए। कांग्रेस को पांच वोट की जरूरत है। कांग्रेस पुराने संबंध के आधार पर बसपा से ही आसानी से समर्थन हासिल करना मान रही है। मध्य प्रदेश में बसपा कांग्रेस का समर्थन कर चुकी है।
कांग्रेस का मानना है कि यूपी में भी सपा और रालोद में नजदीकी के चलते बसपा से ही राजनीतिक समर्थन मिल सकता है। दरअसल उत्तराखंड में कांग्रेस के हरीश रावत की सरकार को बसपा ने अपने विधायकों का समर्थन दिलाया था उसके बाद हरिद्वार के जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए अपने घोषित प्रत्याशी को बदलकर कांग्रेस के पक्ष में अपने वोटरों से वोटिंग बसपा ने कराई थी। बसपा भी कांग्रेस के साथ खड़ा होने में ही फायदा देख रही है। बसपा खुद को सेक्युलर पेश कर मुस्लिमों में भाजपा के खिलाफ अपने रुख का कड़ा संदेश देना चाहती है। चुनाव बाद त्रिकुंश विधानसभा बनने के हालत में सरकार बनाने के लिए भाजपा का समर्थन हासिल करने की फेल रही अटकलों को भी बसपा का कांग्रेस को समर्थन देकर विराम लगाना मकसद है।