पलानीसामी, जो बाद में पार्टी महासचिव चुन लिए गए थे, ने अदालत के इस फैसले को न्याय, धर्म और सत्य की जीत बताया। उन्होंने कहा, इससे जनरल काउंसिल के फैसले को मान्यता मिली है। सत्य हमारे साथ था, यही वजह है कि हमें यह जीत हासिल हुई। पार्टी कार्यकर्ताओं ने पटाखे फोड़कर और मिठाइयां बांटकर कोर्ट के फैसले पर अपनी खुशी जाहिर है। गौरतलब है कि यह फैसला ओपीएस के लिए एक और झटका है, जो पिछले साल से ही जनरल काउंसिल के प्रस्तावों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।
पिछले साल सितंबर में मद्रास हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने पूर्व के एकल पीठ के उस आदेश को रद कर दिया था जिसमें पार्टी की 23 जून 2022 की यथास्थिति बहाल रखने को कहा गया था। तब पनीरसेल्वम समन्वयक और पलानीस्वामी संयुक्त समन्वयक थे और पार्टी दोनों के साझे फैसलों से चलती थी। पिछले वर्ष 11 जुलाई की पार्टी जनरल काउंसिल बैठक के प्रस्तावों के खिलाफ ओपीएस की याचिका को 28 मार्च को एकल पीठ खारिज कर चुकी थी। उन्होंने और उनके सहयोगियों ने इसके खिलाफ ही खंडपीठ के समक्ष याचिका दी थी, जिसे शुक्रवार को कोर्ट ने खारिज कर दिया।
'फासीवादी भाजपा मुर्दाबाद का नारा लगाना अपराध नहीं'
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि ‘फासीवादी भाजपा मुर्दाबाद’ का नारा लगाना कोई अपराध नहीं है। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और तेलंगाना की वर्तमान राज्यपाल व पुडुचेरी की उपराज्यपाल तमिलिसाई सौंदर्यराजन की उपस्थिति में विमान में भाजपा सरकार के खिलाफ नारे लगाने के आरोप में गिरफ्तार लोइस सोफिया के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया।
मदुरै पीठ के जस्टिस पी धनबल ने कहा, एफआईआर के मुताबिक सोफिया ने सिर्फ ‘फासीवादी भाजपा’ का नारा लगाया था और ये शब्द कोई अपराध नहीं थे और प्रकृति में तुच्छ थे। आईपीसी की धारा 290 के तहत सार्वजनिक उपद्रव के अपराध को आकर्षित करने के लिए आरोप पत्र में इसके अलावा कुछ भी नहीं है। ऐसे में 2018 में दाखिल एफआईआर और न्यायिक मजिस्ट्रेट 3 के समक्ष दाखिल किए गए आरोपपत्र को रद्द किया जाता है।
तमिलनाडु भाजपा के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष और मामले में हस्तक्षेपकर्ता के अन्नामलाई ने तर्क दिया कि पुलिस नागरिक उड्डयन सुरक्षा अधिनियम 1982 के खिलाफ गैरकानूनी कृत्यों के दमन के तहत मामला दर्ज करने में विफल रही। हालांकि, अदालत ने कहा, उक्त अधिनियम लागू नहीं होगा चूंकि सोफिया की ओर से कोई हिंसा नहीं की गई थी और सिर्फ शब्द बोलने से खतरे की संभावना नहीं थी।
कोर्ट ने कहा, दिलचस्प बात यह है कि एफआईआर शुरू में आईपीसी की धारा 209 (सार्वजनिक उपद्रव) और तमिलनाडु सिटी पुलिस अधिनियम की धारा 75 (सार्वजनिक स्थानों पर नशे या दंगे या अभद्र व्यवहार के लिए जुर्माना) के तहत दर्ज की गई थी, दोनों गैर-संज्ञेय अपराध हैं। हालांकि, धारा 505(1)(बी), जो एक संज्ञेय अपराध है, को बाद में शिकायत में बिना किसी कथन के प्रिंटेड एफआईआर में हाथ से लिखा गया था। इसको ध्यान में रखते हुए मजिस्ट्रेट ने सोफिया को धारा 505(1)(बी) के तहत रिमांड में भेजने से भी इन्कार कर दिया। उन्हें सिर्फ आईपीसी की धारा 209 (सार्वजनिक उपद्रव) और तमिलनाडु सिटी पुलिस अधिनियम की धारा 75 के तहत रिमांड में भेजा गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार धारा 505 के तहत रिमांड खारिज हो जाने के बाद, पुलिस का कर्तव्य है कि वह सीआरपीसी की धारा 155 के तहत प्रक्रिया का पालन करे। हालांकि, वर्तमान मामले में, प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। शिकायत में किसी भी सामग्री के बिना, सिर्फ एफआईआर में आईपीसी की धारा 505 को शामिल करना, कानून के तहत विचार की गई प्रक्रिया से भटकने के लिए पर्याप्त नहीं था।