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Air India Tragedy: अहमदाबाद विमान हादसे में देवदूत बने थे दमकलकर्मी, इनके साहस की बदौलत आज भी सांस ले रहे लोग

Fri, 12 Jun 2026 02:16 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

History Of India's Fire Service: अहमदाबाद विमान हादसा केवल एक विमान दुर्घटना ही नहीं रहा, बल्कि यह भारत की फायर ब्रिगेड के साहस, समर्पण और चुनौतियों की भी कहानी बन गई। 1.25 लाख लीटर ईंधन से लगी भीषण आग, 1000 डिग्री तक पहुंचा तापमान और चारों तरफ फैले धुएं के बीच 650 दमकलकर्मियों ने 10 घंटे तक लगातार राहत अभियान चलाकर 28 लोगों की जान बचाई। यह हादसा बताता है कि फायर ब्रिगेड सिर्फ आग बुझाने वाली सेवा नहीं, बल्कि आपदा के समय उम्मीद की आखिरी किरण होती है। हालांकि दिल्ली समेत देश के कई शहर आज भी संसाधनों, स्टाफ और आधुनिक तकनीक की कमी से जूझ रहे हैं। ऐसे में इन सबके बीच आज हम दमकल विभाग के इतिहास पर भी नजर डालेंगे....
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दमकल सेवा का इतिहास - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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12 जून का दिन अहमदाबाद के इतिहास में हमेशा एक दर्दनाक तारीख के रूप में याद किया जाएगा। दोपहर का समय था। एअर इंडिया की एआई-171 उड़ान लंदन के लिए रवाना हुई थी। विमान ने उड़ान भरी ही थी कि कुछ मिनट बाद वह मेघानीनगर स्थित मेडिकल कॉलेज हॉस्टल परिसर पर जा गिरा। अगले कुछ सेकंड में जो हुआ, उसने पूरे शहर को दहला दिया। 
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विमान के टकराते ही जोरदार विस्फोट हुआ और देखते ही देखते पूरा इलाका आग के विशाल गोले में बदल गया। विमान में सवार 242 लोगों में से 241 लोगों की मौत हो गई। जमीन पर मौजूद 19 लोगों की भी जान चली गई। केवल एक यात्री जीवित बच पाया। लेकिन इस त्रासदी के बीच एक और कहानी लिखी जा रही थी।

यह कहानी उन दमकलकर्मियों की थी जो आग, धुएं और मौत के बीच जिंदगी की तलाश कर रहे थे। इस रिपोर्ट में जानेंगे कि कैसे 650 कर्मियों और 91 वाहनों ने मोर्चा संभाला। इस दौरान दमकलकर्मियों ने अपने साहस का बखूबी परिचय दिया। साथ ही ये भी समझेंगे कि दमकल विभाग में मौजूदा समय में क्या चुनौतिया हैं? दुनिया के मुकाबले हमारे देश का यह विभाग कहां खड़ा है...

हादसे की पहली सूचना मिलते ही कैसे शुरू हुई जंग?

अहमदाबाद के मुख्य अग्निशमन अधिकारी अमित डोंगरे को दोपहर 1 बजकर 43 मिनट पर विमान दुर्घटना की सूचना मिली। शुरुआत में अधिकारियों को लगा कि शायद कोई छोटा विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ है। लेकिन कुछ ही मिनटों में स्पष्ट हो गया कि यह एक अंतरराष्ट्रीय उड़ान थी। जैसे ही यह जानकारी सामने आई कि विमान उड़ान भरते समय दुर्घटनाग्रस्त हुआ है, अधिकारियों को स्थिति की गंभीरता का अंदाजा हो गया। उड़ान भरने वाले विमान में हमेशा बड़ी मात्रा में ईंधन मौजूद रहता है। इसका मतलब था कि घटनास्थल पर आग और विस्फोट का खतरा सामान्य दुर्घटनाओं से कई गुना अधिक होगा।
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मौजूद ईंधन ने त्रासदी को और भयावह बना दिया

विमान में लगभग 1.25 लाख लीटर एविएशन टरबाइन फ्यूल था। यह बेहद ज्वलनशील ईंधन माना जाता है। विमान के जमीन से टकराते ही ईंधन में विस्फोट हुआ और एक विशाल अग्निगोला तैयार हो गया। अधिकारियों के अनुसार आग का तापमान 800 से 1000 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। इतनी भीषण गर्मी में किसी इंसान का घटनास्थल के पास खड़ा रहना भी मुश्किल था। घना धुआं पूरे इलाके में फैल गया था। कई जगहों पर कुछ मीटर दूर तक देख पाना भी संभव नहीं था। इसके बावजूद फायर ब्रिगेड की टीमों को उसी धुएं और आग के बीच जाकर राहत अभियान चलाना था।

घटनास्थल पर पहुंचने के बाद क्या दृश्य था?

जब फायर ब्रिगेड की पहली टीम घटनास्थल पर पहुंची तो वहां चारों ओर अफरा-तफरी का माहौल था। मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल की इमारतें क्षतिग्रस्त थीं। विमान के टुकड़े कई हिस्सों में बिखरे पड़े थे। आसपास खड़े वाहन जल रहे थे। पेड़ों में आग लगी हुई थी। कुछ इमारतों के अंदर लोग फंसे होने की आशंका थी। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि किसी को यह नहीं पता था कि कितने लोग जिंदा हैं और कितने लोग मलबे के नीचे दबे हुए हैं। ऐसे हालात में हर सेकंड कीमती था।

बचाव अभियान के दौरान सबसे बड़ी चुनौती क्या थी?

फायर अधिकारियों के सामने दो लक्ष्य थे। पहला, आग को फैलने से रोकना। दूसरा, जीवित लोगों को तलाशकर बाहर निकालना। घना धुआं, लगातार बढ़ती आग और विस्फोट का खतरा राहत कार्य में बाधा बन रहे थे। घटनास्थल पर एलपीजी सिलेंडर भी मौजूद थे। यदि वे फटते तो स्थिति और भयावह हो सकती थी। कई पेड़ आग की चपेट में थे और आसपास के ढांचों तक आग पहुंचने का खतरा था। इसलिए राहतकर्मियों को एक साथ कई मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ रही थी।

28 लोगों की जान कैसे बचाई गई?

फायर ब्रिगेड ने अपने कर्मियों को अलग-अलग टीमों में बांटा। कुछ टीमें आग बुझाने में जुट गईं, जबकि दूसरी टीमें प्रभावित इमारतों के अंदर दाखिल हुईं। उन्होंने एक-एक कमरे की तलाशी ली। कई जगहों पर धुएं के कारण सांस लेना मुश्किल था। इसके बावजूद राहतकर्मी अंदर जाते रहे। इस अभियान के दौरान कुल 28 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया। सबसे खास बात यह रही कि किसी भी व्यक्ति को पीछे न छोड़ने के लिए प्रत्येक इमारत की चार-चार बार तलाशी ली गई। यह केवल ड्यूटी नहीं थी, बल्कि लोगों की जिंदगी बचाने का संकल्प था।

क्या केवल फायर ब्रिगेड ने ही यह लड़ाई लड़ी?

नहीं, यह सामूहिक प्रयास का उदाहरण था। पुलिस ने ग्रीन कॉरिडोर बनाया ताकि फायर टेंडर और एम्बुलेंस तेजी से घटनास्थल तक पहुंच सकें। 108 एम्बुलेंस सेवा ने घायलों को अस्पताल पहुंचाने का काम किया। एयरपोर्ट प्रशासन, स्थानीय प्रशासन और स्वयंसेवकों ने भी सहयोग दिया। आपदा प्रबंधन में अक्सर कहा जाता है कि किसी एक एजेंसी की सफलता सभी एजेंसियों के समन्वय पर निर्भर करती है। अहमदाबाद में यह बात पूरी तरह सच साबित हुई।

650 कर्मियों और 91 वाहनों ने कैसे संभाला मोर्चा?

  • इस अभियान में लगभग 650 फायर कर्मी और 91 वाहन लगाए गए। जलते वाहनों को हटाया गया। एलपीजी सिलेंडरों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। सूखे और जलते पेड़ों को काटा गया ताकि आग आगे न फैले। शाम तक आग पर काफी हद तक काबू पा लिया गया था, लेकिन खोज अभियान देर रात तक चलता रहा। यह केवल आग बुझाने का अभियान नहीं था, बल्कि एक बड़े पैमाने का आपदा प्रबंधन ऑपरेशन था।
  • अमित डोंगरे 22 वर्षों से फायर सर्विस में हैं। उन्होंने दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में कई बड़ी घटनाएं देखी हैं। लेकिन उनका कहना है कि यह उनके करियर का सबसे कठिन अभियान था। कारण केवल आग नहीं थी। विमान दुर्घटना, बड़ी संख्या में लोगों की मौत, अत्यधिक तापमान, घना धुआं और एक साथ कई इमारतों में राहत अभियान जैसी परिस्थितियां बहुत कम देखने को मिलती हैं। यही वजह है कि अहमदाबाद का यह ऑपरेशन भारतीय फायर सर्विस के इतिहास में लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

इस हादसे ने यह दिखा दिया कि किसी भी शहर की सुरक्षा व्यवस्था में फायर ब्रिगेड कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आमतौर पर लोग फायर ब्रिगेड को केवल आग बुझाने वाली सेवा मानते हैं, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं बड़ी है। यह सेवा आग, सड़क हादसे, इमारत ढहने, बाढ़, रासायनिक दुर्घटनाओं और विमान हादसों तक में सबसे आगे खड़ी दिखाई देती है। अहमदाबाद की घटना ने साबित किया कि जब हर तरफ धुआं, आग और मौत का साया हो, तब फायर ब्रिगेड ही उम्मीद की आखिरी किरण बनकर सामने आती है। अब आइए, दमकल विभाग के इतिहास और मौजूदा चुनौतियों पर भी एक नजर डालते हैं...

भारत में फायर ब्रिगेड की शुरुआत क्यों हुई?

आज जब हम किसी आग, सड़क हादसे या आपदा के दौरान फायर ब्रिगेड को सबसे पहले मौके पर पहुंचते देखते हैं, तो शायद ही कभी यह सोचते हैं कि इस सेवा की शुरुआत कैसे हुई होगी। भारत में फायर ब्रिगेड का जन्म किसी एक कानून या सरकारी योजना से नहीं हुआ था। इसकी शुरुआत शहरों में बार-बार लगने वाली भीषण आग और उससे होने वाले बड़े नुकसान की वजह से हुई। 18वीं और 19वीं सदी में बंबई, कलकत्ता और मद्रास जैसे शहर तेजी से विकसित हो रहे थे। उस समय अधिकांश इमारतें लकड़ी और ज्वलनशील सामग्री से बनी होती थीं। एक छोटी सी चिंगारी भी पूरे इलाके को राख में बदल सकती थी। ऐसे में संगठित अग्निशमन व्यवस्था की जरूरत महसूस हुई।

भारत की पहली फायर ब्रिगेड कब बनी?

इतिहासकारों के अनुसार 1803 में बंबई में लगी एक बड़ी आग के बाद वहां संगठित फायर सेवा की नींव रखी गई। बाद में इसे औपचारिक रूप दिया गया और पुलिस प्रशासन के अधीन संचालित किया गया। इसके बाद 1822 में कोलकाता, 1896 में दिल्ली और 1908 में मद्रास में भी संगठित फायर सेवाओं का विकास शुरू हुआ। शुरुआती दौर में इन सेवाओं के पास सीमित संसाधन थे। घोड़ों से खींची जाने वाली गाड़ियां, हाथ से चलने वाले पंप और सीमित संख्या में कर्मचारी ही उनकी ताकत थे। लेकिन उस समय के लिए यह व्यवस्था भी एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी।

1944 का बॉम्बे डॉक विस्फोट क्यों बना बड़ा मोड़?

भारत में आधुनिक फायर सेवा के इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ 14 अप्रैल 1944 को आया। मुंबई के विक्टोरिया डॉक में खड़े एसएस फोर्ट स्टिकीन जहाज में आग लगी और फिर भीषण विस्फोट हुआ। इस हादसे में सैकड़ों लोगों की जान चली गई और कई फायरकर्मी भी शहीद हो गए। इस घटना ने पूरे देश को यह अहसास कराया कि आग और औद्योगिक दुर्घटनाओं से निपटने के लिए आधुनिक उपकरणों, बेहतर प्रशिक्षण और मजबूत फायर सर्विस की जरूरत है। इसी घटना की याद में हर साल 14 अप्रैल को राष्ट्रीय अग्निशमन सेवा दिवस मनाया जाता है।

क्या आज की फायर ब्रिगेड सिर्फ आग बुझाने का काम करती है?

नहीं, समय के साथ फायर ब्रिगेड की भूमिका बहुत व्यापक हो गई है। आज फायर कर्मी केवल आग बुझाने तक सीमित नहीं हैं। सड़क दुर्घटनाओं में फंसे लोगों को निकालना, बाढ़ में बचाव कार्य, ऊंची इमारतों से रेस्क्यू, गैस रिसाव, रासायनिक हादसे, इमारत गिरने की घटनाएं, लिफ्ट में फंसे लोगों को बचाना और प्राकृतिक आपदाओं में राहत पहुंचाना भी उनकी जिम्मेदारी है। कई राज्यों में फायर सर्विस अब फायर एंड इमरजेंसी सर्विस के नाम से काम करती है क्योंकि उसकी भूमिका आपदा प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।

दिल्ली की फायर सर्विस को लेकर चिंता क्यों बढ़ी?

हाल ही में दिल्ली सरकार की समीक्षा में सामने आया कि दिल्ली फायर सर्विस आज भी उस वायरलेस संचार प्रणाली के ढांचे पर निर्भर है जिसकी शुरुआत 1969 में हुई थी। उस समय दिल्ली में केवल 17 फायर स्टेशन थे। आज राजधानी में 71 फायर स्टेशन हैं, लेकिन संचार प्रणाली का मूल ढांचा उसी दौर का है। विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक महानगर में यह व्यवस्था पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। ऊंची इमारतें, भूमिगत पार्किंग, मेट्रो नेटवर्क और घनी आबादी वाले इलाकों में बेहतर संचार व्यवस्था की जरूरत होती है। यही वजह है कि दिल्ली अब अपने फायर नेटवर्क के बड़े आधुनिकीकरण की तैयारी कर रही है।

क्या ट्रैफिक फायर ब्रिगेड की सबसे बड़ी दुश्मन बन चुका है?

दिल्ली के हौज रानी अग्निकांड के बाद कई फायरकर्मियों ने कहा कि उनकी पहली लड़ाई आग से नहीं बल्कि ट्रैफिक से थी। यह समस्या केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। मुंबई, बंगलूरू, हैदराबाद, पुणे और कोलकाता जैसे शहरों में भी फायर टेंडर अक्सर जाम में फंस जाते हैं। कई बार संकरी गलियां, अवैध पार्किंग और रास्ता न देने वाले वाहन बचाव कार्य में देरी का कारण बनते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आग लगने के बाद शुरुआती 10 मिनट सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। यदि फायर ब्रिगेड जल्दी पहुंच जाए तो कई जानें बचाई जा सकती हैं।

देश के अन्य शहरों में फायर ब्रिगेड की क्या स्थिति है?

देश के कई बड़े शहरों में फायर सेवाएं संसाधनों की कमी से जूझ रही हैं। हैदराबाद में विशेषज्ञों का कहना है कि शहर को करीब 200 फायर स्टेशनों की जरूरत है, जबकि उपलब्ध संख्या इससे काफी कम है। नागपुर में स्टाफ की भारी कमी की रिपोर्ट सामने आई है। अहमदाबाद में तेजी से बढ़ते शहरी विस्तार के कारण अतिरिक्त संसाधनों की मांग बढ़ रही है। कई शहरों में फायरकर्मी लंबे समय तक ड्यूटी करने को मजबूर हैं। यह स्थिति बताती है कि शहरी विकास की रफ्तार और फायर सेवाओं के विस्तार के बीच बड़ा अंतर मौजूद है।
 

शहर

समस्या

दिल्ली

पुरानी संचार व्यवस्था  

हैदराबाद

स्टेशनों की कमी

नागपुर

स्टाफ की कमी

अहमदाबाद  

संसाधनों पर दबाव

क्या भारत में फायर ब्रिगेड के पास पर्याप्त संसाधन हैं?

राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि देश में फायर स्टेशनों, फायर वाहनों और प्रशिक्षित कर्मियों की कमी लंबे समय से चिंता का विषय बनी हुई है। कई राज्यों में स्वीकृत पदों पर नियुक्तियां नहीं हो पाई हैं। कुछ शहरों में आधुनिक हाई-राइज रेस्क्यू उपकरण हैं, लेकिन कई जगह अब भी पुराने वाहन और सीमित तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी से बढ़ते शहरों और ऊंची इमारतों के दौर में यह स्थिति भविष्य में और बड़ी चुनौती बन सकती है।

दुनिया के मुकाबले भारत कहां खड़ा है?

दुनिया के विकसित देशों ने फायर सर्विस को आधुनिक तकनीक से जोड़ दिया है। ब्रिटेन में फायर, पुलिस और एम्बुलेंस सेवाएं एकीकृत डिजिटल नेटवर्क के जरिए जुड़ी रहती हैं। जर्मनी में हजारों बेस स्टेशनों और लाखों डिजिटल उपकरणों के जरिए आपदा एजेंसियों को जोड़ा गया है। सिंगापुर में हाई-राइज इमारतों और भूमिगत ढांचों के लिए विशेष संचार प्रणाली मौजूद है। अमेरिका में जीपीएस आधारित ट्रैकिंग, इंटेलिजेंट डिस्पैच सिस्टम और भवनों के भीतर रेडियो नेटवर्क जैसी सुविधाएं आम हैं। इसके मुकाबले भारत में अभी भी कई शहर बुनियादी संचार और संसाधन संबंधी चुनौतियों से जूझ रहे हैं।

भारत को किन सुधारों की सबसे ज्यादा जरूरत है?

देश में मौजूदा समय को देखते हुए सबसे पहले फायर स्टेशनों की संख्या बढ़ानी होगी। इसके साथ ही नए फायरकर्मियों की भर्ती, आधुनिक प्रशिक्षण, हाई-राइज रेस्क्यू उपकरण, ड्रोन तकनीक, बेहतर संचार नेटवर्क और जीपीएस आधारित डिस्पैच सिस्टम की जरूरत है। शहरों में फायर लेन को सख्ती से लागू करना भी जरूरी है ताकि आपातकाल के समय फायर टेंडर बिना बाधा घटनास्थल तक पहुंच सकें। इसके अलावा नागरिकों में अग्नि सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

क्या फायर ब्रिगेड को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना होगा?

इस सवाल का जवाब स्पष्ट रूप से हां है। भारत तेजी से शहरीकरण के दौर से गुजर रहा है। ऊंची इमारतें, बड़े मॉल, औद्योगिक क्षेत्र, मेट्रो नेटवर्क और स्मार्ट सिटी परियोजनाएं लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में आग और आपदा की प्रकृति भी बदल रही है। भविष्य की फायर सर्विस को केवल आग बुझाने वाली इकाई नहीं, बल्कि तकनीक से लैस एक आधुनिक आपदा प्रतिक्रिया बल बनना होगा। अहमदाबाद विमान हादसे जैसी घटनाएं दिखाती हैं कि संकट के समय सबसे पहले लोगों की उम्मीद फायर ब्रिगेड पर ही टिकती है।

क्यों जरूरी है फायर ब्रिगेड पर नई सोच?

अहमदाबाद विमान हादसे ने एक बार फिर साबित कर दिया कि फायर ब्रिगेड केवल एक सरकारी विभाग नहीं, बल्कि आपदा के समय जीवन और मृत्यु के बीच खड़ी सबसे महत्वपूर्ण सेवा है। 10 घंटे तक आग, धुएं और विस्फोट के खतरे के बीच डटे दमकलकर्मियों ने दिखाया कि साहस और प्रशिक्षण किस तरह लोगों की जान बचा सकता है। लेकिन यह भी सच है कि भारत की फायर सेवाओं को अभी लंबा सफर तय करना है। यदि देश को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार होना है, तो फायर ब्रिगेड को संसाधनों, तकनीक और मानवबल के स्तर पर उसी प्राथमिकता से मजबूत करना होगा, जिस प्राथमिकता से हम सड़क, रेल या हवाई ढांचे का विकास करते हैं। क्योंकि किसी भी आपदा में सबसे कीमती चीज उपकरण नहीं, बल्कि समय होता है, और समय बचाने का सबसे बड़ा भरोसा आज भी फायर ब्रिगेड ही है।
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