आरएसएस के एक पुराने कार्यकर्ता भौचक रह गए। मामला कुछ यूं था कि साहब सिफारिश लेकर एक मंत्री जी से मिलने पहुंच गए। कुशल क्षेम, चाय पानी के बाद जैसे ही उन्होंने अपने आने की वजह बताई, मंत्री जी बिदक गए। लगे समझाने कि पहले तो आप लोग कहते थे कार्यकर्ताओं के काम नहीं हो रहे हैं और अब हो रहे हैं तो सीधे चले आ रहे हैं। अध्यक्ष जी ने कह दिया है और अब आप प्रॉपर चैनल आइए। बेचारे टका सा मुंह लेकर लौट आए।
यही हाल एक वकील साहब के साथ हुआ। वह जुगाड़ खोजकर विधि एवं न्याय मंत्रालय में राज्यमंत्री डी चौधरी के पास पहुंच गए। चौधरी ने इसी तरह का जवाब देकर उन्हें अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (एबीएपी) में भरत जी के पास जाने की सलाह दे दी। मंत्री जी ने बताया कि अध्यक्ष जी के सख्त आदेश के बाद हम लोग ना तो अपने मन से किसी का काम कर रहे हैं और न ही किसी की मेरिट देख रहे हैं।
बताते हैं यह हाल सभी मंत्रालयों में है। आरएसएस का डंडा चल रहा है। कोई भी काम उसके अनुषांगिक संगठनों की सिफारिश पर ही हो रहे हैं। ऐसा पिछले छह-सात महीने से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा मंत्रियों को सख्त हिदायत देने के बाद हो रहा है। इसकी वजह भी 2019 का लगातार ऊंचाई बढ़ाता पहाड़ बताया जा रहा है।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गुर्राकर फिलहाल लाज बचा ली है। बताते हैं उन्हें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी आश्वासन मिल गया है। यहां तक आने के लिए नीतीश कुमार को कई पापड़ बेलने पड़े। लालू यादव को फोन करने से लेकर दिल्ली में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बहाने आंख तक दिखानी पड़ी।
यह वही नीतीश कुमार हैं जो कुछ समय पहले प्रधानमंत्री से मिले थे। प्रशासनिक कामकाज की चर्चा के बाद जैसे ही राजनीति पर आना चाहे तो पीएम ने भाजपा अध्यक्ष से चर्चा करने की सलाह दे दी। बिहार के मुख्यमंत्री भौचक्के से रह गए थे। जब कुमार ने अपने प्रतिनिधि भाजपा अध्यक्ष के पास भेजा तो नतीजा टका सा ही रहा। बताते हैं बदलाव का सुर देखकर नीतीश कुमार के पांव के नीचे से जमीन खिसक गई थी, लेकिन पटना में शाह के साथ नाश्ता और डिनर ने एक बार फिर उम्मीदें जगा दी हैं।
भाजपा को आशंका है कि शायद रालोसपा के उपेन्द्र कुशवाहा उसका साथ छोड़ दें। इसके बाद नीतीश कुमार की पार्टी को 2019 के लिए एडजस्ट करने में कोई खास परेशान नहीं उठानी पड़ेगी। अब देखिए यह काठ की हांड़ी कब आंच पर चढ़ती है।
कोई माने या न माने। मायावती ने भाजपा की नींद उड़ा रखी है। जब से मायावती ने गठबंधन की नाव पर सवारी करने की मंशा जताई है, उत्तर प्रदेश हो या मध्य प्रदेश सब परेशान हैं। उत्तर प्रदेश के भाजपा नेता तो मानकर चल रहे हैं कि मायावती, कांग्रेस, सपा साथ आए तो उत्तर प्रदेश में नाव डूबनी तय है। मध्य प्रदेश में माजरा बदल सकता है।
भाजपा के एक मार्ग दर्शक मंडल के नेता को इसका असर राष्ट्रव्यापी दिखाई पड़ रहा है। सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ चुके भाजपा के अजय अग्रवाल को भी उत्तर प्रदेश में कठिन चुनौती दिखाई देने लगी है। यहां तक कि योगी आदित्यनाथ को भी उत्तर प्रदेश में हुए उपचुनावों के बाद मायावती के प्रभाव का अहसास होने लगा है। लिहाजा वह नई तैयारियों में जुट गए हैं।
गोरखपुर से आने वाले पार्टी और संगठन से जुड़े बड़े नेता भी परेशान हैं। बताते हैं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी हवा का रुख भांपकर पसीना पोछने में व्यस्त हैं। वहीं माया हैं कि अब कांग्रेस से राष्ट्रीय स्तर का गठबंधन चाहती हैं। जबकि कांग्रेस के नेता चाहते हैं कि यह तालमेल राज्यवार हो। देखते हैं हार्ड बार्गेनर मायावती आगे क्या राजनीतिक गुल खिलाती हैं।
यह तो पुलिस और उसकी जांच बताएगी, लेकिन संघ और भाजपा के नेता भी यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि कुख्यात अपराधी मुन्ना बजरंगी को किसने मारा? एक केंद्रीय मंत्री से चर्चा हो रही थी। बात-बात में वह पूछ बैठे कि इसको लेकर आप लोगों को क्या लग रहा है? मंत्री जी की उत्सुकता देखकर बगल में बैठे नौकरशाह झेंपने लगे।
दरअसल यह सवाल नौकरशाह को भी परेशान करने लगा कि मुन्ना बजरंगी को किसने मारा? मसलन सात गोली मुन्ना बजरंगी को चली, लेकिन दस चली। दो फोटो वायरल हुई। एक में सीने पर गोली के निशान हैं और दूसरे में नहीं। फिर पिस्टल कहां से आई? यह कैसी जेल सुरक्षा है। आदि...आदि? जबकि यह सब जानते हैं कि मुन्ना बजरंगी को जेल में बंद सुनील राठी ने मारा है। उसने अपना जुर्म कुबूल भी कर लिया है। जांच जारी है।
बताते हैं इलाहाबाद, बनारस, जौनपुर, आजमगढ़, गाजीपुर, गोरखपुर में संघ और भाजपा के नेता मुन्ना बजरंगी के मारे जाने पर जश्न भी मना रहे हैं। इलाहाबाद से संघ से जुड़े और उप्र. के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह के करीबी के अनुसार 2019 में भाजपा को इसका फायदा भी मिलेगा, क्योंकि इस घटना से सामाजिक समीकरण बदलेंगे।
लखनऊ से उठे एक पासपोर्ट विवाद ने देश को हिलाकर रख दिया। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी सोशल मीडिया में निशाने पर आ गई। लेकिन एक सवाल अब भी मौजूद है। इसका विदेश मंत्रालय के अधिकारी कोई जवाब नहीं दे पा रहे हैं।
उनका कहना है कि आप खुद ही विदेश मंत्री से पूछ लीजिए। हुआ यह कि विदेश मंत्री के हस्तक्षेप के बाद आनन-फानन में पुलिस वेरीफिकेशन जांच को दरकिनार करते हुए विदेश मंत्रालय ने अनस सिद्दीकी और तन्वी सेठ को पासपोर्ट जारी कर दिया, लेकिन इसके बाद पुलिस की वेरीफिकेशन जांच को फिर से अनिवार्य बता दिया गया है। इसको लेकर जहां इस मामले की जांच करने वाले अफसर सकते में हैं, वहीं विदेश मंत्रालय हाई प्रोफाइल बन चुके मामले पर चुप्पी साधकर काम चला रहा है।
फूल रही है वायुसेना की सांस
नया-नवेला अग्रिम पंक्ति का फाइटरजेट सुखोई-30 एमके आई धड़ा धड़ गिर रहा है। अभी तक मिग ने ही वायुसेना की सांसत बढ़ा रखी थी। वायुसेना के पायलट मिग सिरीज के लड़ाकू विमानों की ऑपरेशनल उड़ान को लेकर किंचित परेशान हो जाते थे, लेकिन अब सुखोई भी इसी श्रेणी में आने लगा है। रूस के तकनीकी विशेषज्ञ इसके लिए हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड में बने सुखोई की गुणवत्ता पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि वायुसेना इसका निदान चाह रही है।
पिछले कुछ वर्षों से वायुसेना इसके लिए कड़ी मेहनत कर रही है। उसकी उम्मीदें केंद्र सरकार की पहल पर टिकी हैं। हाल में रिटायर हुए एक एयरकमोडोर के मुताबिक फिलहाल इसका समाधान करीब नहीं दिखाई पड़ रहा है। ऐसे में वायुसेना की सांसे फूल रही हैं। हों भी क्यों न। बेड़े में 200 सुखोई हैं। 1997 से भारतीय वायुसेना में शामिल होने शुरू हुए थे, 2009 से गिरने (दुर्घटना का शिकार) होने शुरू हो गए।
अब तक करीब दस सुखोई दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं। एक लड़ाकू विमान के पायलट को तैयार करने में जहां वायुसेना को 10-12 करोड़ रुपये की राशि खर्च करनी पड़ती है, वहीं जानदार पायलट पाने में 4-5 साल का समय लग जाता है। यानी मशीन भी गई और मैन भी गया। दूसरे अभी यही तो वायुसेना के पास नंबर वन का जंगी विमान भी है। राफेल तो अभी राफेल है।
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधारा राजे ने भले ही प्रदेश अध्यक्ष बनवाने में सफलता पा ली है, लेकिन आने वाले दिन उनके लिए परेशानी भरे हो सकते हैं। हालांकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि राजस्थान में सत्ता में लौटने वाला चुनाव प्रचार अभियान चलेगा, लेकिन सूत्र बताते हैं कि केंद्रीय चुनाव प्रचार अभियान समिति आदि के माध्यम से वसुंधरा की नकेल कसी जा सकती है।
राजस्थान में वसुंधरा का विरोधी खेमा प्रचारित करने में जुट गया है कि आगे देखते जाइए। टिकट वितरण से लेकर अभी काफी कुछ होना है। बताते हैं वसुंधरा की जल्द ही पूरे राजस्थान में शुरू होने वाली गौरव सुराज यात्रा में ही तमाम परेशानियां खड़ी हो सकती है। हालांकि भाजपा की केंद्रीय इकाई ने वसुंधरा को ही मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने का मन बनाया है, लेकिन चुनाव में मिलने वाली सारी सफलता का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी जी के नाम किया जाना है। भाजपा अध्यक्ष ने इसमें शुरुआती सफलता भी पा ली है। देखिए आगे होता क्या है।
विपक्ष ही नहीं सत्ता पक्ष के नेताओं को भी 2019 का इंतजार है। कई धुरंधरों को लग रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता में नहीं लौटने वाले। इस उम्मीद को तब और ऑक्सीजन मिल गई, जब केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री नितिन गड़करी ने एक इंटरव्यू में खुद को प्रधानमंत्री की दौड़ से बाहर बता डाला। हालांकि गडकरी ने 2019 में भाजपा के पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने का दावा किया है, लेकिन उनके वक्तव्य के मायने निकाले जा रहे हैं।
दरअसल गडकरी जहां संघ के दुलारे हैं, वहीं मोदी सरकार में उनका काम भी बोल रहा है। यह बात प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष के खेमे को जरा कम हजम हो रही है। लोगों को दूसरी ऑक्सीजन केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के चेहरे पर लगातार लोट रही रौनक से मिल रही है। यहां तक कि गुजरात चुनाव के दौरान कांग्रेस को परेशानी में डालने वाले अजय अग्रवाल भी कुछ नहीं समझ पा रहे हैं।
अजय अग्रवाल खुद बताते हैं कि जब उन्होंने कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर के घर पाकिस्तान के डिप्लोमैट्स की बैठक का मुद्दा उछाला था तो भाजपा के कई बड़े नेताओं ने उनकी खिंचाई कर दी थी। एक बड़े नेता ने बुलाकर कह दिया था कि आपने मुद्दा उछालकर गुजरात में भाजपा की सरकार बनवा दी। लीजिए अब मोदी-शाह को झेलिए। अग्रवाल बताते हैं कि लोग आज भी तंज कसते हैं।
लोगों को लग रहा था कि इसके बदले में अग्रवाल को कम से कम राज्यसभा तो मिल ही जाएगी, लेकिन वह भी टॉप रहे हैं। अग्रवाल के बारे में भाजपाई बताते हैं कि वह जाकर लोगों को मीडिया क्लीपिंग दिखाकर क्रेडिट पाने को बेताब हैं।