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कांग्रेस: लादी हुई प्रतिक्रिया की राजनीति को ढो रहे राहुल तो सोनिया बनीं अपने 'लाडले' की ढाल

सार

गुलाम नबी आजाद कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे चुके हैं। जिसके बाद पार्टी नेताओं की मनमर्जी वाली प्रतिक्रिया सामने आ रही हैं। जानकारों का कहना है कि गुलाम नबी आजाद जैसे वरिष्ठ नेता का पार्टी छोड़ना, अभी शुरुआत भर है। 
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सोनिया गांधी(फाइल) - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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गुलाम नबी आजाद के इस्तीफे से कांग्रेस पार्टी में भूचाल सा आ गया है। नेताओं की मनमर्जी वाली प्रतिक्रिया सामने आ रही हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि गुलाम नबी आजाद जैसे वरिष्ठ नेता का पार्टी छोड़ना, यह तो अभी शुरुआत भर है। ये सिलसिला तो आगे भी जारी रहेगा। अभी तो मनीष तिवारी और आनंद शर्मा भी कुछ तय नहीं कर पा रहे। कपिल सिब्बल तो ‘सपा‘ की मेहरबानी से राज्यसभा में बैठ गए हैं। कांग्रेस, भटकाव की स्थिति में है। भारत जोड़ो यात्रा से पहले पार्टी में मची यह उथल-पुथल शुभ नहीं बताई जा रही। राहुल गांधी, लादी हुई प्रतिक्रिया की राजनीति को ढो रहे हैं तो सोनिया गांधी, पार्टी को खुश रखते हुए अपने ‘लाडले‘ की ढाल बनी हुई हैं। वे किसी भी सूरत में ‘राहुल‘ को कमजोर नहीं होने देना चाहती। दूसरी ओर भाजपा है, जो यह मानकर कि अब उनका ‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ मिशन खत्म हो चुका है, राज्यों के मजबूत क्षेत्रीय दलों को जमीन पर लाने की मुहिम शुरु कर दी गई है।

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विपक्षी दल, नवीनीकरण होगा या बनेंगे इतिहास 

जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर एवं राजनीतिक विश्लेषक डॉ. आनंद कुमार कहते हैं, मौजूदा समय की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों में राजनेताओं की जो छवि बन रही है, वह वास्तविकता से बहुत दूर है। देश के एक बड़े राजनीतिक दल का ताश के पत्तों की तरह ढहना और वोटों का कम प्रतिशत लेकर सत्ता तक पहुंची पार्टी द्वारा विपक्ष व मजबूत क्षेत्रीय दलों को टारगेट पर लेना, ये सब राजनीतिक पतन की निशानी है। इसमें दो ही काम होंगे। एक, विपक्षी दलों का नवीनीकरण हो जाएगा या वे इतिहास बन जाएंगे। हालांकि यह जिम्मेदारी समाज की है। समाज अपनी क्षमता के अनुसार उपकरण तैयार करता है। राजनीतिक दल, समाज के ही तो औजार होते हैं। वह उनसे अलग-अलग काम लेता है। राजनीति में क्षेत्रीय विषमता और अस्मिता, दोनों को समेटने के लिए भाजपा ने ‘हिंदूत्व‘ का कार्ड खेला। उसे कामयाबी भी मिल गई। दूसरा, भाजपा के सफल होने का एक बड़ा कारण दिशाहीन ‘कांग्रेस‘ पार्टी भी है। मौजूदा दौर में कांग्रेस पार्टी किसी भी वर्ग के लिए उपयोगी नहीं हो रही। 

‘भारत जोड़ो यात्रा‘ एक सार्थक मुहिम, बशर्ते... 
प्रो. आनंद बताते हैं, कांग्रेस को दोबारा से समाज के साथ जुड़ना होगा। ये आसान काम नहीं है। इसमें बहुत मशक्कत करनी होगी। ‘भारत जोड़ो यात्रा‘ एक सार्थक मुहिम साबित हो सकती है, बशर्ते उसमें पार्टी के बड़े नेता खुद जनता के बीच रहें। दूसरी ओर, भाजपा को कांग्रेस की कमजोरी से खुश नहीं होना चाहिए। राजनीति में कई तरह के बदलाव खुद ब खुद हो जाते हैं। जवाहर लाल नेहरू व इंदिरा गांधी के समय में कांग्रेस को वामपंथ, अपना घर लगता था। अब भाजपा को मौका मिला तो उसने आम लोगों से दूरी बनाकर उद्योपतियों को साथ रख लिया। वोटों का कम प्रतिशत लेकर सत्ता में आ बैठे। कांग्रेस पार्टी और दूसरे विपक्षी दल, 2024 के लिए कसरत कर रहे हैं। इससे पहले उन्हें अपना जनाधार ठीक करना होगा। कार्यक्रम आधारित संयुक्त टीमें बनानी होंगी। नए यंत्र तलाशने पड़ेंगे। 77 में जनता पार्टी तो बाद में इंदिरा कांग्रेस बनी थी। तिवारी कांग्रेस का नाम भी आया। क्षेत्रीयता कभी राष्ट्रीयता का विकल्प नहीं बनेगी। ऐसे में कांग्रेस को जनता से जुड़ना होगा। राहुल गांधी की लादी हुई प्रतिक्रिया की राजनीति नहीं चल सकती। भाजपा ने राम मंदिर और जम्मू कश्मीर जैसे मुद्दे को आगे बढ़ा दिया। उसे कामयाबी भी मिल गई। यह पार्टी अपने एजेंडे पर जा रही है। दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष एवं युवराज राहुल गांधी हैं, वे केवल ‘मोदी का विरोध‘ इसी एजेंडे पर दाव लगा बैठे हैं। 
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कांग्रेस दे, इन तीन सवालों का जवाब...
देश की जनता तीन सवालों को लेकर बहुत मुखर है। इनमें महंगाई, बेरोजगारी व सांप्रदायिकता शामिल है। राहुल गांधी, मोदी विरोध में मग्न हैं, लेकिन वे इन तीन सवालों का जवाब नहीं बताते। जनता यही तो समझना चाहती है कि क्या राहुल के पास इन समस्याओं के हल के लिए कोई बेहतर विकल्प है। कांग्रेस पार्टी कभी ये नहीं बताती। राष्ट्र निर्माण के लिए ‘भारत जोड़ो यात्रा‘ बेहतर हो सकती है। इसमें भी तभी कामयाबी मिलेगी, जब कांग्रेस पार्टी लोगों की भाषा समझेगी। पीएम रहे चंद्रशेखर ने भी लंबी पदयात्रा की थी, तभी लोगों के बीच उनकी स्वीकृति बनी। आंध्रप्रदेश में राजशेखर रेड्डी को पैदल घूमना पड़ा, तभी उनकी उपयोगिता लोगों को नजर आई थी। 

विषम परिस्थिति में पार्टी हो जाती है फूट का शिकार..
कांग्रेस पार्टी को नजदीक से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, देश में दर्जनभर से ज्यादा मजबूत दल हैं। सभी दलों में कोई न कोई प्रभावी जननेता भी है। कांग्रेस में अनेक ऐसे नेता हैं, जिनकी कभी समाज में बड़ी मान्यता रही है। ऐसे कई नेता हैं जो इंदिरा गांधी के दौर से लेकर अभी तक पार्टी में रहे हैं। 
कांग्रेस पार्टी की दिक्कत ये है जब कभी विषम परिस्थिति आती है तो पार्टी में फूट डल जाती है। 77 में दो तिहाई पार्टी नेता चले गए थे। तिवारी कांग्रेस बनी और माधव राव सिंधिया ने भी मध्यप्रदेश विकास कांग्रेस बना ली थी। बाद में इनकी घर वापसी भी हुई। 2014 और 2019 में कांग्रेस की हार के बाद भी पार्टी दो फाड़ नहीं हुई, लेकिन पार्टी में एक ऐसा समूह बन गया, जो केवल दोष ही मढ़ने में लगा रहा। कठिन समय को कांग्रेस पार्टी में गंभीरता से नहीं लिया जाता। कांग्रेस में जब भी ऐसा वक्त आता है तो वहां ‘जी 23‘ यानी ‘खफा नेताओं का समूह‘ बन जाता है या गुलाम नबी जैसा प्रकरण हो जाता है। वे पचास साल तक कांग्रेस में रहे। राज्यसभा में लंबे कार्यकाल का आनंद लिया। अब भड़ास निकाल रहे हैं। 

अपने युवराज की हिफाजत भी करती रहीं...
दरअसल, सोनिया गांधी ने सभी को साथ लेकर चलने का प्रयास किया। उन्होंने अपने बेटे राहुल को पार्टी में कभी कमजोर नहीं होने दिया। वे पार्टी को भी खुश रखती रही और अपने युवराज की हिफाजत भी करती रहीं। पार्टी के कार्यकर्ता असमंजस में रहे कि कहां जाएं। उन्हें यह पता नहीं कि पार्टी में बॉस कौन है। हर छह माह में कोई न कोई नेता निकल रहा है। सभी मौका देख रहे हैं। भाजपा ऐसे नेताओं का भरपूर इस्तेमाल करने के लिए तैयार बैठी है। गुलाम नबी आजाद नई पार्टी खड़ी कर जम्मू कश्मीर में भाजपा को फायदा पहुंचा सकते हैं। कांग्रेस के इस संकट के दौर में भाजपा ने भी सलाह दी है। शहनवाज हुसैन ने कहा, इस पार्टी को ‘भारत जोड़ो यात्रा‘ से पहले लीडरशिप को कांग्रेस से जोड़ो, अभियान शुरु करना चाहिए। उन्होंने कहा, कांग्रेस से बिछड़े सब बारी-बारी, आजादी की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाली कांग्रेस से उसके वरिष्ठ नेता ही आजाद होना चाहते हैं। गुलाम नबी साहब कांग्रेस से आजाद हो गए।

मंत्रियों के चपरासी रहे लोग ज्ञान देते हैं...
कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने गुलाम नबी आजाद के इस्तीफे और चिट्ठी की टाइमिंग को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। उन्होंने पार्टी में अनेक पदों को संभाला है। अब संघर्ष करने की बजाय उन्होंने पार्टी को छोड़ने का काम किया है। इसका मतलब, वे कहीं न कहीं अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट गए हैं। मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, राहुल गांधी के अलावा कोई विकल्प नहीं है। राहुल गांधी से अनुरोध किया जाएगा कि वह पार्टी की खातिर, देश की खातिर, आरएसएस-भाजपा से लड़ने के लिए पार्टी अध्यक्ष की कमान संभालें। पंजाब से कांग्रेस के सांसद मनीष तिवारी ने कहा, जो लोग वार्ड का चुनाव लड़ने की क्षमता नहीं रखते, वे कांग्रेस का इतिहास बता रहे हैं। मंत्रियों के चपरासी रहे लोग, कांग्रेस के बारे में ज्ञान देते हैं। सोनिया गांधी को पत्र लिखे जाने के बाद दस राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को शिकस्त मिली है। अगर कांग्रेस का ख्याल और भारत का ख्याल एक है तो फिर कांग्रेस के ख्याल में फर्क आ रहा है या फिर भारत के ख्याल में फर्क आ रहा है। 1885 से चला आ रहा कांग्रेस और भारत का यह सामंजस्य कैसे टूट रहा है। पार्टी को आत्मचिंतन की सख्त जरूरत है।

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